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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 994 of 1416

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Page 994

९६२ भैषज्यरत्नावली । [ शोथ-

शठी करिकणा बिल्वं मञ्जिष्ठा च ततः क्रमात् ।
प्रत्येकार्द्धपलं चैषां पेषयित्वा विनिक्षिपेत् ॥ १५ ॥

१-सूखीमूली, दशमूल, पीपलामूल और पुनर्नवा ये प्रत्येक औषधि एक एक प्रस्थ ( ६४ तोले ) लेकर अठगुने जलमें अलग अलग पकावे । जब पकते पकते चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । फिर उस क्वाथमें तिलका तेल १ आढक ( ८ सेर ), गोमूत्र १ आढक एवं सूखीमूली, गिलोय, सोंठ, परवल, पीपलामूल, खिरैंटी, पाठ, पुनर्नवामूल, सुगंधवाला, खस, सहिंजनके बीज, निर्गुण्डी, भाँग, सारिवा, करंजुआ, अडूसा, पीपल, हरड, वच, पोहकरमूल, रायसन, वायविडंग, चव्य, हल्दी, दारुहल्दी, धनियाँ, जवाखार, सज्जी, सेंधानमक, देवदारु, पद्माख, कचूर, गजपीपल, बेलकी छाल और मंजीठ इन औषधियोंके दो दो तोले भागको एकत्र बारीक पीसकर डालदेवे और फिर उत्तम प्रकार तेलको सिद्ध करे ॥ ११०-१५ ॥

अभ्यङ्गेनास्य तैलस्य ये गुणास्तांस्ततः शृणु ।
नानाशोथा विनश्यन्ति वातपित्तकफोद्भवाः ॥ १६ ॥
मलोद्भवाश्च ये केचिद्विशेषेण जलाश्रयाः ।
अवश्यं निर्जरा देहा भविष्यन्ति न संशयः ॥ १७ ॥

इस तेलके जो गुण हैं उनको कहता हूँ सुनो—शरीरपर इसकी मालिश करनेसे अथवा नस्य देनेसे अनेक प्रकारसे उत्पन्न हुए शोथ, जैसे कि वातज पित्तज और कफज शोथ, मलोत्पन्न शोथ, विशेषकर जलदोषोत्पन्न शोथ अवश्य नाश होते हैं । इसके प्रभावसे रोगी जन जरारहित अर्थात् देवसमान तरुणशरीरवाले होजाते हैं ॥ १६ ॥ १७ ॥

शुष्कमूलरसप्रस्थं शिग्रुधुस्तूरयोस्तथा ।
सिन्दुवाररसप्रस्थं दशमूलरसं तथा ॥ १८ ॥
पारिभद्ररसप्रस्थं वर्षाभूप्रस्थमेव च ।
करञ्जस्य रसप्रस्थं प्रस्थं वरुणकस्य च ॥ १९ ॥
तैलप्रस्थं समादाय भिषग्यत्नाद्विपाचयेत् ।
कल्केरर्द्धपलैरेतैः शुण्ठीमरिचसैन्धवैः ॥ १२० ॥
पुनर्नवाकाकमाचीशैलूत्वक्पिप्पलीयुगैः ।
कट्फलं पौष्करं शृङ्गी रास्ना यासश्च कारवी ॥ २१ ॥