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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 995 of 1416

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Page 995

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ९६३

हरिद्राद्वयपूतीकद्वयानन्तायुगैः पृथक् ।
तत्साधु सिद्धं विज्ञाय शुभे भाण्डे निधापयेत् ॥ २२ ॥

२-सूखी मूलीका रस १ प्रस्थ ( ६४ तोले ), सहिंजनेका रस १ प्रस्थ, धतूरेका रस १ प्रस्थ, सिङ्गालूका रस १ प्रस्थ, दशमूलकी सब औषधोंका क्वाथ १ प्रस्थ, फरहदका रस १ प्रस्थ, पुनर्नवेका रस १ प्रस्थ, करञ्जुएकी छालका रस १ प्रस्थ, और तिलका तेल १ प्रस्थ लेवे। फिर सबको एकत्रकर विधिपूर्वक पकावे। पकते समय उसमें—सोंठ, मिरच, सेंधानमक, पुनर्नवा, मकोय, लसोडेकी छाल, पपिल, गजपीपल, कायफल, पोहकरमूल, काकडासिंगी, रास्ना, जवासा, कालाजीरा, हल्दी, दारुहल्दी, करंजुआ, काँटाकरञ्ज, अनन्तमूल और सारिवा इन औषधियोंके दो दो तोले कल्कको डालकर तेलको सिद्ध करे। जब उत्तम प्रकारसे पककर तैयार होजाय तब किसी उत्तम पात्रमें भरकर रखदेवे ॥ १८–१२२ ॥

वातश्लेष्मकृतं दोषं सन्निपातभवं तथा ।
निहन्ति सर्वजं शोथमुदरश्वासनाशनम् ॥ २३ ॥
विरुद्धभेषजभवं शोथमाशु व्यपोहति ।
व्रणशोथाक्षिशूलघ्नं कामलापाण्डुनाशनम् ॥ २४ ॥
ये चान्ये व्याधयः सन्ति श्लेष्मजाः सन्निपातजाः ।
तान्सर्वात्राशयत्याशु सूर्यस्तम इवोदितः ॥ २५ ॥

इस तेलको मर्दन करनेसे वात-कफजन्य शोथ, सन्निपातजन्य शोथ और अन्य सर्व प्रकारके शोथ एवं उदररोग, श्वास और प्रकृतिविरुद्ध औषध व्यवहार करनेसे उत्पन्न हुआ शोथ तत्काल नाश होता है तथा व्रणजन्य शोथ, नेत्रशूल, कामला, पाण्डुरोग, कफोत्पन्न रोग, त्रिदोषज रोग एवं अन्यान्य अनेक प्रकारकी जो अतिदारुण व्याधियें हैं उन सबोंको यह तेल इस प्रकार नाश करदेता है, जिस प्रकार सूर्योदयके होतेही अंधकारका समूह नष्ट होजाता है ॥

शोथशार्दूल तेल ।

धुस्तूरो दशमूलं च सिन्दुवारो जयन्तिका ।
पुनर्नवा करञ्जश्च षट् पलानि प्रगृह्य च ॥ २६ ॥
जलद्रोणे विपक्तव्यं ग्राह्यं पादावशेषितम् ।
प्रस्थं च कटुतैलस्य कल्कान्येतानि दापयेत् ॥ २७ ॥