भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in context५६८ भैषज्यरत्नावली । [ अरोचक-
देवपुष्पं बाणमितं रसपादं तथाऽमृतम् ।
माषमात्रं च तत्सेव्यं नागरेण गुडेन वा ॥
सर्वारोचकशूलार्त्तिमामवातं सुदारुणम् ॥ २७ ॥
शुद्ध पारा १ तोला और शुद्ध गन्धक १ तोला, दोनोंकी कज्जली करके दन्तीके क्वाथ, जम्बीरीनीम्बूके रस, अदरखके रस, बिजौरेनींबूके रस और बिजौरेनीम्बूके बीजोंके रसमें क्रमसे भावना देकर सुखालेवे। फिर उसमें सुहागा दो तोले, लौंग ५ तोले और शुद्ध मीठा तेलिया ३ माशे मिलाकर खरल करलेवे। इस रसको प्रतिदिन एक एक मासेकी मात्रासे सोंठके चूर्ण अथवा गुडके साथ मिलाकर सेवन करनेसे सब प्रकारकी अरुचि, शूल और दारुण आमवातरोग नष्ट होता है ॥ २५-२७ ॥
सुलोचनाभ्रक ।
पलं सुजीर्णं गगनं तु वज्रकं तेजोवती कोलमुशीर-
दाडिमम् । धात्र्यम्ललोणीरुचकं पृथक् दशपलोन्मितं
मर्दितमेव सेवितम् ॥ २८ ॥ अरोचकं वातकफत्रिदोषजं
पित्तोद्भवं गन्धसमुद्भवं नृणाम्। कासं स्वराघातमुरोग्रहं
रुजं श्वासं बलासं यकृतं भगन्दरम् ॥ २९ ॥ प्लीहाग्नि-
मान्द्य श्वयथुं समीरणं मेहं भृशं कुष्ठमसृग्दरं कृमिम् ।
शूलाम्लपित्तक्षयरोगमुद्धतं सरक्तपित्तं वमिदाहमश्म-
रीम् । निहन्ति चार्शांसि सुलोचनाभ्रकं बलप्रदं वृष्य-
तमं रसायनम् ॥ ३० ॥
वज्र अभ्रककी पुरानी भस्म ४ तोले, चव्य, बेरकी गुठलीकी मींग, खस, अनार, आमले, चाङ्गेरी, नौनिया और बिजौरेनींबुके बीज प्रत्येक दस दस पल लेकर सबका एकत्र बारीक चूर्ण करके सेवन करे। यह सुलोचनाभ्रक वात, कफ और पित्त इन पृथक् २ दोषोंसे अथवा तीनों दोषोंके मिलनेसे उत्पन्न हुई वा दुर्गन्धजनित अरुचि एवं खाँसी, स्वरभेद, उररोग, श्वास, कफविकार, यकृत, भगन्दर, प्लीहा, मन्दाग्नि, शोथ, वातरोग, प्रमेह, कुष्ठ, रक्तप्रदर, कृमिरोग, शूल, अम्लपित्त, वमन, दाह, पथरी और सर्वप्रकारकी बवासीर इन सम्पूर्ण व्याधियोंको नष्ट करता है एवं अत्यन्त बलकारक, वीर्यवर्द्धक और रसायन है ॥ २८-३० ॥