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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 599 of 1416

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Page 599

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ५६७


एषा वृकोदरकृता सुरसा रसाला
आस्वादिता भगवता मधुसूदनेन ॥ २१ ॥
"रसाला बृंहणी वृष्या स्निग्धा बल्या रुचिप्रदा "॥

खट्टा दही ४ सेर, सफेद खाँड ६४ तोले, गोघृत ४ तोले, शहद ४ तोले, कालीमिरच २ तोले, सोंठ २ तोले एवं दारचीनी, तेजपात, छोटी इलायची और नागकेशर ये प्रत्येक औषधि दो दो तोले लेवे। फिर सफेद पत्थरपर मृदुकरपल्लवोंवाली ललनाके द्वारा पीसेहुए ओषधियोंके चूर्णको और अन्य सब पदार्थोंको एकत्र मिलाकर कपूरके द्वारा सुवासित कियेहुए पात्रमें भरकर रख देवे। इस अत्यन्त स्वादिष्ट रसालेको भीमसेनने बनाया था और भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रने आस्वादन किया था। “यह रसाला अत्यन्त पुष्टिकारक, वीर्यवर्द्धक, स्निग्ध, बलकारक और रुचिकर है” २०॥२१

रसकेसरी ।

रसगन्धौ समौ शुद्धौ दन्तीक्वाथेन मर्दयेत् ।
देवपुष्पं बाणमितं रसपादं तथाऽमृतम् ॥ २२ ॥
माषमात्रं च तत्सेव्यं नागरेण गुडेन वा ।
सर्वारोचकशूलार्त्तिमामवातं विनाशयेत् ॥ २३ ॥
विषूचीमग्निमान्द्यं च भक्तद्वेषं सुदारुणम् ।
रसो निवारयत्येष केशरी करिणं यथा ॥ २४ ॥

शुद्ध पारा १ तोला और शुद्ध गन्धक १ तोला दोनोंकी कज्जली, लौंग ५ तोले और शुद्ध मीठा तेलिया ३ मासे इन सबको एकत्र दन्तीके क्वाथके द्वारा खरल करके एक एक मासेकी गोलियाँ बनालेवे। इसको सोंठके चूर्ण अथवा गुडके साथ मिलाकर सेवन करनेसे सब प्रकारकी अरुचि, शूल, आमवात, विषूचिका और मन्दाग्नि आदि रोग दूर होते हैं। यह रस विशेषकर अरुचिको तो इस प्रकार दूर करदेता है जैसे सिंह हाथीको ॥ २२–२४ ॥

सुधानिधि रस ।

रसगन्धौ समौ शुद्धौ दन्तीक्वाथेन भावयेत् ।
जम्बीरस्वरसेनैव आर्द्रकस्य रसेन च ॥ २५ ॥
मातुलुङ्गस्य तोयेन तस्य मञ्जरसेन च ।
पश्चाद्विशोष्य सर्वांशं टङ्कणं चावतारयेत् ॥ २६ ॥