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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 531 of 1416

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Page 531

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ४९९


धात्रीविदारीक्षुरसे त्रिपात्रे पयसोऽर्मणे ।
सुपिष्टैर्जीवनीयैश्च पाराशरमिदं घृतम् ॥
ससैन्यं राजयक्ष्माणमुन्मूलयति शीलितम् ॥ ८९ ॥

मुलहठी, खिरैंटी, गिलोय और लघुपञ्चमूल इन सब ओषधियोंको १०० पल लेकर दो द्रोण जलमें पकावे । जब आठवाँ भाग जल शेष रहजाय, तब उतारकर छानलेवे । फिर उसमें घी ८ सेर, आमले, विदारीकन्द और ईख इनका रस २४ सेर, दूध एक द्रोण और जीवनीयगणकी समस्त ओषधियोंका चूर्ण चार चार तोले लेकर दूधमें पीसकर डालदेवे, फिर विधिपूर्वक घृतको पकावे । यह पाराशरनामक घृत प्रतिदिन नियमपूर्वक सेवन करनेसे संपूर्ण उपद्रवोंसे युक्त राजयक्ष्मारोगको समूल नष्ट करदेता है ॥ ८८ ॥ ८९ ॥

अजापञ्चक घृत ।

छागशकृद्रसमूत्रक्षीरैर्दध्ना च साधितं सर्पिः ।
सक्षारं यक्ष्महरं कासश्वासोपशान्तये परमम् ॥ १९० ॥

बकरीकी विष्ठाका रस, मूत्र, दूध, दही और बकरीका घी ये सब समान भाग और घृतसे चौथाई भाग जवारखार लेकर सबको एकत्र करके घृतको पकावे । यह घृत राजयक्ष्माको हरनेवाला और कास, श्वासादि रोगोंको शान्त करनेके लिये परम उपयोगी है ॥ १९० ॥

छागलाद्यघृत १–२ ।

छागमांसतुलां गृह्य साधयेन्नलवणेऽम्भसि ।
पादशेषेण तेनैव सर्पिः प्रस्थं विपाचयेत् ॥ ९१ ॥
ऋद्धिवृद्धी च मेदे द्वे जीवकर्षभकौ तथा ।
काकोलीक्षीरकाकोलीकल्कैः पृथक् पलोन्मितैः ॥९२॥
सम्यक् सिद्धे चावतार्य शीते तस्मिन् प्रदापयेत् ।
शर्करायाः पलान्यष्टौ मधुनः कुडवं क्षिपेत् ॥ ९३ ॥

१-बकरेके मांसको १०० पल लेकर एक द्रोण जलमें पकावे । जब चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे। फिर उसमें घी ६४ तोले, ऋद्धि, वृद्धि मेदा, महामेदा, जीवक, ऋषभक, काकोली और क्षीरकाकोली इन सब ओषधियोंका कल्क चार चार तोले डालकर घृतको पकावे । जब उत्तम प्रकारसे पककर सिद्ध होजाय तब नीचे उतारकर शीतल होजानेपर उसमें खाँड ३२ तोले और शहद १६ तोले डालकर सबको मिलादेवे ॥ ९१–९३ ॥