भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in context। ४९८ भैषज्यरत्नावली । [ यक्ष्मरोग-
अश्वगन्धासिताभीरुमेदायुग्मत्रिकण्टकैः ।
मृणालविषशालूकशृङ्गाटककशेरुकैः ॥ ८४ ॥
गंगेरनको १०० पल लेकर एक द्रोण जलमें पकावे, जब चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे। फिर उस क्वाथमें घी और दूध क्वाथकी समान एवं कंघी, खिरेंटी, मुलहठी, पुनर्नवा, पुण्डेरिया, कुम्भेरु, चिरौंजी, कौंचके बीज, असगन्ध, मिश्री, शतावर, मेदा, महामेदा, गोखुरू, कमलकी नाल, कमलकेशर, भसींडे, सिंघाडे और कशेरू इन सबका दो दो तोले चूर्ण डालकर घृतको सिद्ध करे ॥ ८२–८४ ॥
एतन्नागबलासर्पी रक्तपित्तं क्षतक्षयम् ।
हन्ति दाहं भ्रमं तृष्णां बलपुष्टिकंर परम् ॥ ८५ ॥
बल्यमोजस्यमायुष्यं वलीपलितनाशनम् ।
उपयुंजीत षष्मासान्वृद्धोऽपि तरुणायते ॥ ८६ ॥
इस नागबलाघृतको सेवन करनेसे रक्तपित्त, क्षतक्षय, दाह, भ्रम, तृषा और असमयमें बालोंका पकना, शरीरमें वलियोंका पडना आदि विकार नष्ट होते हैं। यह घृत अत्यन्त बलकारक, पुष्टिकार्क, ओज और आयुवर्द्धक है। इस घृतको छः महीनेपर्यन्त सेवन करनेसे वृद्ध पुरुष भी तरुण हो जाता है ॥ ८५ ॥ ८६
बलागर्भघृत ।
द्विपंचमूलस्य पचेत्कषाये प्रस्थद्वये मांसरसस्य चैके ।
कल्कं बलायाः सुनियोज्य गर्भे सिद्धं पयः प्रस्थयुतं घृतं च ।
सर्वाभिघातोत्थितयक्ष्मशूलक्षतक्षयोत्कासहरं प्रदिष्टम् ॥ ८७ ॥
दशमूलके २ प्रस्थ क्वाथमें मांसरस एक प्रस्थ, खिरेंटीका कल्क चौथाई प्रस्थ, गोघृत १ प्रस्थ और गौका दूध १ प्रस्थ मिलाकर घृतको सिद्ध करे। यह घृत सर्व प्रकारके उपद्रवोंसे उत्पन्न हुए राजयक्ष्मा, शूल, क्षतक्षय और उत्कट खाँसी आदिको हरनेवाला है ॥ ८७ ॥
पाराशरघृत ।
यष्टी बला गुडूच्यल्पपंचमूलीतुलां पचेत् ।
शूर्पेऽपामष्टभागस्थे तत्र पात्रं पचेद् घृतम् ॥ ८८ ॥