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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 532 of 1416

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Page 532

५०० भैषज्यरत्नावली । [ यक्ष्मरोग-


पलं पलं पिबेत्प्रातर्यक्ष्माणं हन्ति दुर्जयम् ।
क्षतक्षयं च कासं च पार्श्वशूलमरोचकम् ॥ ९४ ॥
स्वरक्षयमुरोरोगं श्वासं हन्यात्सुदारुणम् ।
बल्यं मांसकरं वृष्यमग्निसंदीपनं परम् ॥ ९५ ॥

यह घृत प्रतिदिन प्रातःकाल चार चार तोले प्रमाण सेवन करनेसे अतिदुर्जय राजयक्ष्मा, क्षतक्षय, खाँसी, पसलीकी पीडा, अरुचि, स्वरभंग, हृदयरोग और अतिदारुण श्वासको नष्ट करता है। एवं बल, मांस और वीर्यकी अधिक वृद्धि करता और अग्निको अत्यन्त दीपन करता है ॥ ९४ ॥ ९५ ॥

तोयद्रोणद्वितये च्छागलमांसस्य पलशतं पक्त्वा ।
जलमष्टांशं सुकृतं तस्मिन्विपचेद् घृतं प्रस्थम् ॥ ९६ ॥
कल्केन जीवनीयानां कुडवेन तु मांससर्पिरेदम् ।
पित्तानिलं निहन्यात्तज्जानपि रसकयोजितं पीतम् ॥ ९७ ॥
कासश्वासावुग्रौ यक्ष्माणं पार्श्वहृद्रुजां घोराम् ।
अध्वव्यवायशोषं शमयति चैवापरं किञ्चित् ॥ ९८ ॥

२-बकरेके मांसको सौ पल लेकर दो द्रोण जलमें पकावे। जब पकते पकते आठवाँ भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे। फिर उसमें घी एक प्रस्थ और जीवनीगणकी सब औषधियोंका कल्क एक कुडव डालकर घृतको सिद्ध करे। यह छागलाद्यघृत वातज और पित्तज रोग, अत्युग्र खाँसी, श्वास, राजयक्ष्मा, पार्श्वशूल, हृदयरोग, मार्गश्रम, स्त्रीप्रसङ्गकी व्यग्रता, शोष एवं अन्यान्य सम्पूर्ण उपद्रवोंको शमन करता है ॥ ९६-९८ ॥

जीवन्त्याद्यघृत ।

जीवन्तीं मधुकं द्राक्षां फलानि कुटजस्य च ।
शठीं पुष्करमूलं च व्याघ्रीं गोक्षुरकं बलाम् ॥ ९९ ॥
नीलोत्पलं तामलकीं त्रायमाणां दुरालभाम् ।
पिपलीं च समं पिष्ट्वा घृतं वैद्यो विपाचयेत् ॥
एतद् व्याधिसमूहस्य रोगेशस्य समुत्थितम् ।
रूपमेकादशविधं सर्पिरग्र्यं व्यपोहति ॥ २०० ॥

जीवन्ती, मुलहठी, दाख, इन्द्रजौ, कचूर, पोहकरमूल, कटेरी, गोखुरू, खिरेंटी, नीलकमल, भुई आंवला, त्रायमाण, धमासा और पीपल इन सबको