भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in contextचिकित्सा ] | भाषाटीकासहिता । | ४९७
बलाद्यघृत १-२ ।
घृतं बलानागबलार्जुनाम्बुसिद्धं सयष्टीमधुकल्कपादम् ।
हद्रोगशूलक्षतरक्तपित्तकासानिलासृक्शमयत्युदीर्णम् ॥७७
१- खिरेंटी, गंगेरन और अर्जुनकी छाल इन के समान भाग क्वाथमें क्वाथसे चौथाई भाग मुलहठीका कल्क डालकर घृतको सिद्ध करे । यह घृत हृदयरोग, शूल, क्षत, रक्तपित्त, खाँसी और अतिप्रबल वातरक्त इन सबको नष्ट करता है ॥ ७७ ॥
बलां श्वदंष्ट्रां बृहतीं कलसीं धावनीं स्थिराम् ।
निम्बं पर्पटकं मुस्तं त्रायमाणां दुरालभाम् ॥ ७८ ॥
कृत्वा कषायं पेष्यार्थं दद्यात्तामलकीं शठीम् ।
द्राक्षां पुष्करमूलं च मेदामामलकानि च ॥ ७९ ॥
घृतं पयश्च तत्सिद्धं सर्पिर्ज्वरहरं परम् ।
क्षयकासप्रशमनं शिरःपार्श्वरुजापहम् ॥ १८० ॥
चरकोदितवासाद्यघृतानन्तरमुक्तिः ।
वदन्तीह घृतात्क्वाथं पयश्च द्विगुणं पृथक् ॥ ८१ ॥
२- खिरेंटी, गोखुरू, बडी कटेरी, पिठवन, कटेरी, शालपर्णी, नीमकी छाल, पित्तपापडा, नागरमोथा, त्रायमाण और धमासा इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर चौगुने जलमें पकावे । चतुर्थांश जल शेष रहनेपर उतारकर छान लेवे । फिर उसमें भुईं आमला, कचूर, दाख, पोहकरमूल, मेद और आमले इनका बारीक चूर्ण और गोघृत क्वाथसे आधा भाग एवं क्वाथकी समान गोदुग्ध डालकर उत्तम प्रकारसे घृतको सिद्ध करे । इस प्रकार सिद्ध किया हुआ घृत ज्वर, क्षय, खाँसी, शिरःशूल और पसलीकी पीडा आदि सम्पूर्ण उपद्रवोंको दूर करता है। चरकमें वासाद्यघृतके पश्चात् इसी घृतका वर्णन कियागया है। इससे इसमें क्वाथ और दूध घृतसे दुगुने लेना चाहिये ॥ ७८-१८१ ॥
नागबलाघृत ।
पादशेषं जलद्रोणे पचेन्नागबलातुलाम् ।
तेन क्वाथेन तुल्यांशं घृतं क्षीरं च साधयेत् ॥ ८२ ॥
पलार्द्धकैश्चातिबला बला यष्टिः पुनर्नवा ।
प्रपौण्डरीककाश्मर्यपियालकपिकच्छुभिः ॥ ८३ ॥
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