भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in contextप्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । ११
मान (तोल) के बिना द्रव्यों (ओषधियों) की युक्ति ठीक नहीं होती; इस कारण प्रयोगोंके कार्यके लिये यहाँ मानपरिभाषा कही जाती है ॥ ५३ ॥
षट्सर्षपैर्यवस्त्वको गुञ्जैका तु यवैस्त्रिभिः ॥
माषस्तु पञ्चभिः षड्भिस्तथा सप्तभिरष्टभिः ॥ ५४ ॥
दशभिर्द्वादशभिश्च रक्तिभिः षड्विधो मतः ।
चरकस्य तु माषस्तु दशगुञ्जाभिरेव च ॥ ५५ ॥
चरकस्य तु चार्द्धेन सुश्रुतस्य तु माषकः ।
माषैश्चतुर्भिः शाणः स्याद्धरणः स निगद्यते ॥ ५६ ॥
टंकः स एव कथितस्तद्वयं कोल उच्यते ।
क्षुद्रको वटकश्चैव द्रङ्क्षणः स निगद्यते ॥ ५७ ॥
छः सरसोंका एक जौ होता है। तीन जौकी एक गुंजा होती है। पांच रत्तीका, छः रत्तीका, सात रत्तीका, आठ रत्तीका, दश रत्तीका अथवा बारह रत्तीका एक मासा होता है। इस प्रकार देशभेदोंसे मासा छः प्रकारका होता है, चरकके मतसे मासा दश रत्तीका होता है और सुश्रुतके मतसे पांच रत्तीका मासा होता है। चार मासेका एक शाण होता है। उस शाणको धरण तथा टक भी कहते हैं। दो शाणका एक कोल होता है। क्षुद्रक, वटक और द्रंक्षण ये कोलके ही नाम हैं ॥ ५४-५७ ॥
कोलद्वयं तु कर्षः स्यात्स प्रोक्तः पाणिमानिका ।
अक्षः पिचुः पाणितलं किञ्चित्पाणिश्च तिन्दुकम् ॥ ५८ ॥
विडालपदकं चैव तथा षोडशिका मता ।
करमध्यो हंसपदं सुवर्णं कवलग्रहः ॥ ५९ ॥
उदुम्बरं च पर्यायैः कर्षमेव निगद्यते ।
स्यात्कर्षाभ्यामर्द्धपलं शुक्तिरष्टमिका तथा ॥ ६० ॥
शुक्तिभ्यां च पलं ज्ञेयं मुष्टिराम्रं चतुर्थिका ।
प्रकुञ्चः षोडशी बिल्वं पलमेवात्र कीर्त्यते ॥ ६१ ॥
दो कोलका एक कर्ष होता है। पाणिमानिका, अक्ष, पिचु, पाणितल, किञ्चित्पाणि, तिन्दुक, बिडालपदक, षोडशिका, करमध्य, हंसपद, सुवर्ण, कवलग्रह और