भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in context| १२ | भैषज्यरत्नावली । | [ चिकित्सा- |
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उडुम्बर ये सब कर्षके नाम हैं। दो कर्षका अर्द्धपल होता है। शुक्ति और अष्टमिका ये अर्द्धपलके पर्याय हैं। दो शुक्तियोंका एक पल होता है। मुष्टि, आम्र, चतुर्थिका, प्रकुञ्च, षोडशी ओर बिल्व ये पलके नाम हैं ॥ ५८-६१ ॥
पलाभ्यां प्रसृतिर्ज्ञेया प्रसृतं च निगद्यते ।
प्रसृतिभ्यामञ्जलिः स्यात्कुडवोऽर्द्धशरावकः ॥ ६२ ॥
अष्टमानं च स ज्ञेयः कुडवाभ्यां च मानिका ।
शरावोऽष्टपलं तद्वज्ज्ञेयमत्र विचक्षणैः ॥ ६३ ॥
शरावाभ्यां भवेत्प्रस्थश्चतुःप्रस्थैस्तथाऽऽढकः ।
भाजनं कांस्यपात्रं च चतुष्षष्टिपलश्च सः ॥ ६४ ॥
दो पलकी एक प्रसृति होती है, प्रसृतिको प्रसृतभी कहते हैं। दो प्रसृतिकी एक अञ्जलि होती है। कुडव, अर्द्धशराव और अष्टमान ये अञ्जलिके नाम हैं। दो अंजलिकी एक मानिका होती है। शराव और अष्टपल ये मानिकाके नाम हैं। दो शरावका एक प्रस्थ होता है। चार प्रस्थका एक आढक होता है। भाजन, कांस्यपात्र और चतुःषष्टिपल ये आढकके नाम हैं ॥ ६२-६४ ॥
चतुर्भिराधकैर्द्रोणः कलशो नल्वणोऽर्मणः ।
उन्मानं च घटो राशिर्द्रोणपर्यायसंज्ञितः ॥ ६५ ॥
द्रोणाभ्यां शूर्पकुम्भौ च चतुःषष्टिशरावकः ।
शूर्पाभ्यां च भवेद्द्रोणी वाहो गोणी च सा स्मृता ॥ ६६ ॥
द्रोणीचतुष्टयं खारी कथिता सूक्ष्मबुद्धिभिः ।
चतुःसहस्रपलिका षण्णवत्यधिका च सा ॥ ६७ ॥
पलानां द्विसहस्रं च भार एकः प्रकीर्तितः ।
तुला पलशतं ज्ञेयं सर्वत्रैवैष निश्चयः ॥ ६८ ॥
चार आढकका एक द्रोण होता है। कलश, नल्वण, अर्मण, उन्मान, घट और राशि ये द्रोणके नाम हैं। दो द्रोणका एक शूर्प होता है। कुम्भ और चतुःषष्टि शरावक ये शूर्पके नाम हैं। दो शूर्पकी एक द्रोणी होती है। वाह और गोणी ये द्रोणीके नाम हैं। चार द्रोणीकी खारी होती है। यह खारी ४०९६ पलकी होती है। २००० पलका एक भार होता है। और १०० पलकी एक तुला होती है। ऐसा सब ग्रन्थोंका निश्चय है ॥ ६५-६८ ॥