भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in context१० भैषज्यरत्नावली । [ चिकित्सा-
एकमात्र कारण है। इसलिये आरोग्य दान करनेपर सभी दान हो जाते हैं। एक रोगीको आरोग्य करनेसे, उस पुण्यके प्रभावसे वैद्य अपने सात कुलोंके साथ ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है ॥ ४५-४८ ॥
चिकित्सितशरीरं यो न निष्क्रीणाति दुर्मतिः ।
स यत्करोति सुकृतं तत्सर्व्वं भिषग्नुते ॥ ४९ ॥
जो दुर्बुद्धि मनुष्य आरोग्य होकर वैद्यसे उऋण नहीं होता, वह मनुष्य जो कुछ सत्कर्म करता है वे सब वैद्यको प्राप्त हो जाते हैं ॥ ४९ ॥
दर्शनस्पर्शनप्रश्नैर्व्याधेर्ज्ञानं त्रिधा मतम् ।
दर्शनान्मूत्रजिह्वाद्यैः स्पर्शनान्नाडिकादिभिः ॥
प्रश्नैर्दूत'दिवचनादिति त्रेधा समुच्यते ॥ ५० ॥
दर्शन, स्पर्शन और प्रश्न इन तीन प्रकारसे रोगकी परीक्षा करनी चाहिये । अर्थात् मूत्र और जिह्वादिका दर्शन, नाडी आदिका स्पर्शन एवं रोगी और दूत आदिसे रोगसम्बन्धी विषयको पूछना-इस प्रकार रोगपरीक्षाके ये तीन प्रकार कहेगये हैं॥५०॥
रोगमादौ परीक्षेत ततोऽनन्तरमौषधम् ।
ततः कर्म भिषक् पश्चात् ज्ञानपूर्व्वं समाचरेत् ॥ ५१ ॥
सबसे प्रथम वैद्य रोगकी परीक्षा (अर्थात् कौनसा रोग है ?) उसका निदान पूर्वरूप और रूपादिके द्वारा निर्धारित करना और वह निर्दिष्ट रोग साध्य वा असाध्य इत्यादिका निर्धारित करना और इसके पश्चात् औषधि-परीक्षा करे, फिर विधिपूर्वक चिकित्सामें प्रवृत्त होवे ॥ ५१ ॥
यथा विषं यथा शस्त्रं यथाऽग्निरशनिर्यथा ।
तथौषधमविज्ञातं विज्ञातममृतं यथा ॥ ५२ ॥
विना जानी हुई औषधि प्रयोग करनेपर-विष, अस्त्र, अग्नि और वज्रकी समान अनिष्टकारी होती है, किन्तु ओषधिके गुणोंको जानलेनेपर उसका प्रयोग करनेसे वह अमृतके समान हितकारी होती है ॥ ५२ ॥
मानकी परिभाषा ।
न मानेन विना युक्तिर्द्रव्याणां जायते क्वचित् ।
अतः प्रयोगकार्य्यार्थं मानमत्रोच्यतेऽधुना ॥ ५३ ॥