भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in contextप्रकरणम् ] भाषाटीकासहित । ९
नाभिज्ञाय तु शास्त्राणि भेषजं कुरुते भिषक् ।
यम एव स विज्ञेयो मर्त्यानां मर्त्यरूपधृक् ॥ ४२ ॥
कुचैलः कर्कशः स्तब्धः कुग्रामी स्वयमागतः ।
पञ्च वैद्या न पूज्यन्ते धन्वन्तरि समा यदि ॥ ४३ ॥
नाडीजिह्वास्यमूत्राणां कोष्ठादीनां च सर्वथा ।
परीक्षां यो न जानाति स वैद्यो यम एव हि ॥ ४४ ॥
जो वैद्य गुरुके पास आयुर्वेद शास्त्रको पढ़कर और उसको बारम्बार विचारकर चिकित्साकार्यमें प्रवृत्त होता है, वह ही प्रकृष्ट वैद्य है। और दूसरे तो केवल धनको हरण करनेवाले तस्कर हैं और जो वैद्य आयुर्वेद शास्त्रको बिना अध्ययन किये चिकित्सा करना आरम्भ करता है, वह मनुष्योंके लिये मानवरूपधारी यमके समान है। मलिन वस्त्रधारी, कठोर बोलनेवाला, जड़ ( रोगके सम्बन्धमें किसीप्रकारका विवेचन न कर सकनेवाला ), बुरे ग्राममें रहनेवाला और बिना बुलाये अपने आप आनेवाला ऐसे पाँच प्रकारके वैद्य धन्वन्तरिके समान भी हों तो सम्मानको प्राप्त नहीं हो सकते। जिस वैद्यको नाड़ी, जिह्वा, मुख, मूत्र और कोष्ठादिकी परीक्षा मालूम नहीं है, वह वैद्य भी यमके समान है ॥ ४१-४४ ॥
अप्येकं नीरुजं कृत्वा जन्तुं यादृशतादृशम् ।
आयुर्वेदप्रसादेन किं न दत्तं भवेद्भुवि ॥ ४५ ॥
कपिलाकोटिदानाद्धि यत्फलं परिकीर्तितम् ।
फलं तत्कोटिगुणितमेकातुरचिकित्सया ॥ ४६ ॥
धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं कारणं यतः ।
तस्मादारोग्यदानेन नरो भवति सर्वदः ॥ ४७ ॥
अप्येकं नीरुजीकृत्य व्याधितं भेषजैर्नरः ।
प्रयाति ब्रह्मसदनं कुलसप्तकसंयुतः ॥ ४८ ॥
आयुर्वेदके प्रसादसे यदि किसी मनुष्यको आरोग्य कियाजाय तो पृथ्वीमें उस ( जीवनदाता ) ने कौनसा दान नहीं किया। करोड़ों गौओंको दान करनेसे जो फल प्राप्त होता है, उससे करोड गुना अधिक फल रोगीको रोगसे मुक्त करनेमें होता है। इसकारण आरोग्यताही धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इस चतुर्वर्ग प्राप्तिका