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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 386 of 1416

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Page 386

३५४ भैषज्यरत्नावली । [ अर्शोरोग-


न स रोगोऽस्ति यं चापि न निहन्यादिदं क्षणात् ।
करीरकाञ्जिकादीनि ककारादीनि वर्ज्जयेत् ॥
स्रवत्यतोऽन्यथा लौहं देहात् किट्टं च दुर्ज्जयम् ॥ २८ ॥

यह अग्निमुखनामक लोह बावासीरको नष्ट करनेवाला और मन्दाग्निको दीपन करनेवाला है । इसके खानेसे मनुष्यको पत्थरतक हजम हो सकते हैं। इसपर भारी और पुष्टिकारक अन्न पान, दूध और मांसरस ये पदार्थ हितकारी हैं। यह बवासीर, पाण्डुरोग, सूजन, कुष्ठ, प्लीहा, उदररोग, असमयमें बालोंका पकना, आमवात और गुदाके रोग इन सब रोगोंको एवं अन्यान्य और कोईभी ऐसा रोग नहीं है जिसको यह तत्क्षण ही नष्ट न करता हो । इसपर करीर, कांजी, ककडी आदि समस्त ककाराद्य पदार्थ सर्वथा त्यागदेने चाहिये । इस प्रकार न करनेसे शरीरसे लोहेका दुर्जय मैल टपकने लगता है ॥ २५–२८ ॥

चन्द्रप्रभावटिका ।

कृमिरिपुदहनव्योषत्रिफलासुरदारुचव्यभूनिम्बम् ।
मागधिमूलं मुस्तं सशठी वचा धातुमाक्षिकं चैव ॥ २९ ॥
लवणक्षारनिशायुगकुस्तुम्बुरुगजकणातिविषाः ॥ १३० ॥
कर्षांशकान्येव समानि कुर्यात्पलाष्टकं चाश्मजतोर्विदध्यात् ।
निष्पत्रशुद्धस्य पुरस्य धीमान् पलद्वयं लौहरजस्तथैव ॥
सिताचतुष्कं पलमत्र वांश्यानिकुम्भकुम्भीत्रिसुगन्धियुक्तम् ३१

वायविडंग, चीतेकी जड, सोंठ, पीपल, मिरच, हरड, आमला, बहेडा, देवदारु, चव्य, चिरायता, पीपलामूल, नागरमोथा, कचूर, वच, सोनामाखी, सैंधानमक, कालानमक, जवाखार, सज्जी, हल्दी, दारुहल्दी, धनियाँ, गजपीपल और अतीस ये प्रत्येक एक एक कर्ष और शिलाजीत ३२ तोले, शोधित गूगल ८ तोले, लोहभस्म ८ तोले, मिश्री १६ तोले, वंशलोचन ४ तोले, दन्तीकी जड ४ तोले, निसोध ४ तोले, एवं दालचीनी, तेजपात और इलायची ये तीनों मिश्रित ४ तोले लेवे। सबको यथाविधिसे एकत्र मिलाकर एक एक रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे ॥ २९–१३१ ॥

चन्द्रप्रभेयं गुटिका विधेया ह्यर्शांसि निर्नाशयते षडेव ।
भगन्दरं कामलपाण्डुरोगं विनष्टवह्नेः कुरुते च दीप्तिम् ॥
हन्त्यामयान् पित्तकफानिलोत्थान्नाडीगते मर्मगते व्रणे च ॥ ३२