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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 387 of 1416

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Page 387

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ३५५

ग्रन्थ्यर्बुदे विद्रधिराजयक्ष्ममेहे भगारुये प्रदरे च योज्या ।
शुक्रक्षये चाश्मरीमूत्रकृच्छ्रे मूत्रप्रवाहेऽप्युदरामये च ॥३३॥
तक्रानुपानं त्वथ मस्तुपानमाजो रसो जाङ्गलजो रसो वा ।
पयोऽथवा शीतजलानुपानं बलेन नागस्तुरगो जवेन ॥ ३४ ॥
दृष्ट्या सुपर्णः श्रवणे वराहःकान्त्या रतीशो धिषणश्च बुद्ध्या ।
न पानभोज्ये परिहार्यमस्ति न शीतवातातपमैथुनेषु ॥३५॥

यह चन्द्रप्रभानामवाली गुटिका छहों प्रकारके अर्शरोग, भगन्दर, कामला और पाण्डुरोग इनको जडसहित नष्ट करदेती है और नष्ट हुई जठराग्निको फिरसे दीपन करती है। इसको पित्त कफ और वायुसे उत्पन्न हुए विकार, नाडीगतरोग, मर्म-स्थानसम्बन्धी विकार, व्रण, ग्रन्थि, अर्बुद, विद्रधि, राजयक्ष्मा, प्रमेह, भगरोग, प्रदर, शुक्रक्षय, पथरी, मूत्रकृच्छ्र, मूत्रप्रवाह और उदररोग इन सबमें सेवन कराना चाहिये । इसपर मट्ठा, दहीका तोड, बकरेके मांसका रस, जंगली जीवोंका मांभरस, दूध अथवा शीतल जल इनमेंसे किसीएक वस्तुका अनुपान करना चाहिये । इस वटीके सेवन करनेवाला बलमें हाथीके समान, वेगमें घोडेके समान, दृष्टिमें गरुडके समान, सुननेमें वराहके समान, कान्तिमें कामदेवके समान, और बुद्धिमें वृहस्पतिके समान होजाता है। इसपर खान पानके शीत, वायु, धूप और मैथुन आदिका कुछ भी परहेज नहीं है ॥ ३२-३५ ॥

शम्भुं समभ्यर्च्य कृतप्रणामं प्राप्ता गुटी चन्द्रमसः प्रसादात ॥
संमर्च्य मधुसर्पिर्भ्यामादौ रक्तिचतुष्टयम् ।
भक्ष्यं वृद्ध्या युथाक्ति यावन्माषचतुष्टयम् ॥ ३७ ॥
त्रिवृद्दन्तीत्रिजातानां कर्षमानं पृथक् पृथक् ।
शुक्रदोषान् निहन्त्याशु प्रमेहानपि दारुणान् ॥ ३८ ॥
वलीपलितनिर्मुक्तो वृद्धोऽपि तरुणायते ॥ ३९ ॥
“ वृद्धवैद्योपदेशेन पलार्द्ध रसगन्धकम् ।
केवलं मूच्छितं वापि पलं वा दापयेद्रसम् ॥
अभ्रकं च क्षिपेत् कश्चित पलमानं भिषग्वरः ” ॥४०॥

यह वटी शिवजी महाराजका पूजन करके और उनको प्रणाम करके चन्द्रदेवकी कृपासे प्राप्त की है। अतःप्रतिदिन शिवजीकी अर्चना और वन्दना करके पहले इस