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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 385 of 1416

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Page 385

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ३५३


मानकन्द, जिमीकन्द, भिलावे, निसोत, दन्तीकी जड, सोंठ, पीपल, मिरच, हरड, आमला, बहेडा, चीतेकी जड, नागरमोथा और वायविडंग इन प्रत्येकका चूर्ण समान भाग और सब चूर्णकी बराबर लोहभस्म लेवे। सबको एकत्र खरल करके एक माशेकी मात्रासे सेवन करनेसे अर्शरोग नष्ट होता है ॥ १२० ॥

अग्निमुखलोह।

त्रिवृच्चित्रकनिर्गुण्डीस्नुहीमुण्डीतिकज्जटाः ।
प्रत्येकशोऽष्टपलिका जलद्रोणे विपाचयेत् ॥ २१ ॥
पलत्रयं विडङ्गाच्च व्योषात् कर्षत्रयं पृथक् ।
त्रिफलायाः पञ्चपलं शिलाजतुपलं न्यसेत् ॥ २२ ॥
दिव्यौषधिहतस्यापि वैकङ्कतहतस्य वा ।
पलद्वादशकं देयं रुक्मलोहस्य चूर्णकम् ॥ २३ ॥
चतुर्विंशतपलैराज्यान्मधुशर्करयोरपि ।
घनीभूते सुशीते च दापयेदवतारिते ॥ २४ ॥

निसोत, चीता, सिह्नाळ्ह, थूहर, मुण्डी और भुईआमला ये प्रत्येक बत्तीस तोले लेकर एक द्रोण जलमें पकावे। जब चतुर्थांश जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे। फिर वायविडङ्ग १२ तोले, सोंठ, पीपल और कालीमिरच प्रत्येक चारचार तोले, हरड, आमला और बहेडा प्रत्येक समान भाग मिश्रित २० तोले, शोधित शिलाजीत ४ तोले, मैनशिल अथवा कंटाईके रसद्वारा भस्म कियेहुए रुक्मलोहका चूर्ण १२ पल, एवं गौका घी, शहद और मिश्री प्रत्येक २४-२४ पल लेवे। पाकके नियमानुसार प्रथम घीको चूल्हेपर चढाकर गरम करे फिर उसमें लोहचूर्ण डालकर मन्दमन्द अग्निसे भूने। जब अच्छे प्रकारसे भूनजाय तब उस चूर्णको निकालकर खांडकी चासनी कर उसमें उक्त क्वाथको डालकर धीरे २ पकावे। जब पककर पाक गाढा हो जाय तब शीतल होजानेपर उसमें उक्त ओषधियोंके चूर्णको मिलादेवे ॥ १२१-१२४ ॥

एतदग्निमुखं नाम दुर्नामान्तकरं परम् ।
मन्दमग्निं करोत्याशु कालाग्निसमतेजसम् ॥ २५ ॥
पर्वता अपि जीर्यन्ति प्राशनादस्य देहिनः ।
गुरुवृष्यान्नपानानि पयो मांसरसो हितः ॥ २६ ॥
दुर्नामपाण्डुश्वयथुकुष्ठप्लीहोदरापहम् ।
अकालपलितं हन्यादामवातं गुदामयम् ॥ २७ ॥

२३