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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

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१६२भैषज्यरत्नावली ।[ ज्वर

रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । ये गोलियाँ यथोचित अनुपानके साथ सेवन करनेसे वातज, पित्तज, कफज, त्रिदोषज, द्वन्द्वज, विषमज्वर, धातुगतज्वर आदि सर्वप्रकारके ज्वर तथा खाँसी, श्वास, शोथ, पाण्डुरोग, हलीमक, प्लीहा, अग्रमांस और यकृत् विकार आदि सम्पूर्ण व्याधियोंको विनाश करती हैं ॥ ४१-४६ ॥

बृहच्चिन्तामणिरस ।

रसं गन्धं विषं चैव त्रिकटु त्रैफलं तथा ।
शिलाह्वा रौप्यकं स्वर्णं मौक्तिकं तालकं समम् ॥ ४७ ॥
मृगकस्तुरिकायाश्च ग्राह्यं षाण्माषिकं भिषक् ।
भृङ्गराजरसेनेव तुलस्याः स्वरसेन वा ॥ ४८ ॥
आर्द्रकस्य रसेनैव वटीं कुर्याद् द्विगुञ्जिकाम् ।
चिन्तामणिरसो ह्येष सर्वरोगकुलान्तकृत् ॥ ४९ ॥
सन्निपातज्वरहरः कफरोगविनाशकः ।
एकजं द्वन्द्वजं चैव विविधं विषमज्वरम् ॥ ५० ॥
अग्निमान्द्यं शिरःशूलं विद्रधिं सभगन्दरम् ।
एतान्येवं निहन्त्याशु भास्करस्तिमिरं यथा ॥ ५१ ॥

पारा, गन्धक, मीठातेलिया, साँठ, मिरच, पीपल, हरड, बहेडा, आमला, मैनसिल, रौप्यभस्म, स्वर्णभस्म, मोतीभस्म और हरतालभस्म ये प्रत्येक औषधि एक एक तोला और कस्तूरी ६ माशे लेकर सबको एकत्र खरल करके भाँगरा, तुलसी और अदरखके स्वरसमें क्रमसे एक एक दिनतक भावना देकर दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । (इनमेंसे एक एक गोली अदरखके रसके साथ सेवन करनी चाहिये । ऐसा प्राचीन वैद्योंका उपदेश है ।) यह रस सब प्रकारके रोगोंके, समूल नष्ट करनेवाला है तथा सन्निपातज्वर और कफरोगोंको हरनेवाला, एकदोषज द्विदोषज आदि विविधप्रकारके विषमज्वर, मन्दाग्नि, शिरका शूल, विद्रधि, भगन्दर इत्यादि सम्पूर्ण रोगोंको इस प्रकार शीघ्र नष्ट करदेता है जैसे सूर्य अन्धकारको ॥ ४७-५१ ॥

त्र्याहिकारिरस ।

रसेन गन्धं शङ्खं च शिखिग्रीवं च पादिकम् ।
गोजिह्वया जयन्त्या च तण्डुलींयैश्च भावयेत् ॥ ५२ ॥


१ रसादितालकान्तानां द्रव्याणां भागेष्वनुक्तेष्वपि प्रत्येकं तोलकप्रमाणं ग्राह्यम्, आर्द्रकरसेन सेव्या चेयं इति वृद्धवैद्योपदेशः ।