भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in context. प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । १६३
प्रत्येकं सप्त सप्ताथ शुष्कं गुञ्जाचतुष्टयम् ।
ज्वरघ्नेन घृतेनाद्यात् त्र्याहिकज्वरशान्तये ॥ ५३ ॥
पारा, गन्धक और शङ्खभस्म ये प्रत्येक एक एक तोला और तूतिया सबका चौथाई भाग लेकर सब औषधियोंको गोजिया (गोभी), अरणी और चौलाईका शाक इन प्रत्येकके रसमें क्रमसे सात सात बार भावना देकर चार चार रत्तीकी गोलियाँ बनाकर सुखालेवे । इस रसकी एक एक गोली किसी ज्वरघ्न घृतके साथ सेवन करनी चाहिये । यह रस तृतीयक (तिजारी) ज्वरको शमन करनेके लिये अत्यन्त उपयोगी है ॥ ५२ ॥ ५३ ॥
चातुर्थकारिरस ।
हरितालं शिला तुत्थं शङ्खचूर्णं च गन्धकम् ।
समांशं मर्दयेत्खल्ले कुमारीरससंयुतम् ॥ ५४ ॥
शरावसम्पुटे कृत्वा दत्त्वा गजपुटं पचेत् ।
कुमारिकारसेनैव वल्लमात्रा वटी कृता ॥ ५५ ॥
दत्ता शीतज्वरं हन्ति चातुर्थिकं विशेषतः ।
मरिचैर्घृतयोगेन तक्रं पीत्वा चरेद्वटीम् ॥
एतया वमनं भूत्वा ज्वरस्तस्माद्विनश्यति ॥ ५६ ॥
हरताल, मैनसिल, तूतिया, शंखभस्म और गन्धक इन सबको समान भाग लेकर एकत्र खरल करके घीग्वारके रसमें घोटकर गोलासा बनालेवे । उसको शरावसम्पुटमें बन्द करके गजपुटमें पकावे । स्वाङ्गशीतल होनेपर गोलेको निकालकर फिर घीग्वारके रसमें खरल करके दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । प्रथम रोगीको तक्र पान कराकर फिर इस रसकी गोलीको मिरचोंके चूर्ण और घृतके साथ सेवन करावे । इससे रोगीको वमन होकर शीतज्वर और विशेषकर चातुर्थिकज्वर (चौथियाज्वर) शीघ्र नष्ट होता है ॥ ५४-५६ ॥
विश्वेश्वररस ।
दरदं पारदं गन्धं तुल्यांशं मर्दयेद्रसे ।
अश्वत्थेजे त्र्यहं पश्चाद्रसे कोलकमूलजे ॥ ५७ ॥
निदिग्धिकारसे काकमाचिकाया रसे तथा ।
द्विगुञ्जं वा त्रिगुञ्जं वा गोक्षीरेण प्रदापयेत् ॥
रात्रिञ्चरं निहन्त्याशु नाम्ना विश्वेश्वरो रसः ॥ ५८ ॥