भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in contextप्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । १६१
पारा, गन्धक, वत्सनाभ, लोहभस्म, धतूरेके बीज ये प्रत्येक एकएक भाग ताम्रभस्म, चीतेकी जड और त्रिकुटा (सोंठ, मिरच, पीपल) ये प्रत्येक दो दो भाग लेवे। सबको एकत्र कूटपीसकर जम्बीरी नींबूके बीजोंकी गिरी और अदरखके रसके साथ खरलकरके दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे। उनमेंसे प्रतिदिन दो दो गोली खानेसे ज्वर शीघ्र दूर होता है। यह चिन्तामणिरस वातज, पित्तज, कफज और सन्निपातजन्यज्वर, एकतरा, द्वयाहिक, चौथिया, तिजारी आदि साध्य अथवा असाध्य भयंकर ज्वरोंको बहुत शीघ्र नष्ट करता है। एवं अग्निकी मन्दता, अजीर्ण, आध्मान (अफारा), वातविकार, अतिसार, अर्दित और अरुचि आदि रोगोंमें विशेष उपकार करता है। यह रस सब प्रकारके ज्वरोंको इस प्रकार तत्काल नष्ट कर देता है जैसा सूर्य अन्धकारको नष्ट करता है॥ ३६-४० ॥
बृहज्ज्वरचिन्तामणिरस ।
रसगन्धकलौहानि ताम्रं तारं हिरण्यकम् ।
हरितालं खर्परं च कांस्यं वङ्गं च विद्रुमम् ॥ ४१ ॥
मुक्तामाक्षिककासीसं शिला च टङ्कणं समम् ।
कर्पूरं च समं दत्त्वा भावना सप्तसप्तकम् ॥ ४२ ॥
भाङ्गीं वासा च निर्गुण्डी नागवल्ली जयन्तिका ।
कारवेल्लं पटोलं च शक्राशनपुनर्नवा ॥ ४३ ॥
आर्द्रकं च ततो दद्यात्प्रत्येकं वारसप्तकम् ।
चिन्तामणिरसो नाम सर्वज्वरविनाशकः ॥ ४४ ॥
वातिकं पैत्तिकं चैव श्लैष्मिकं सान्निपातिकम् ।
द्वन्द्वजं विषमाख्यं च धातुस्थं च ज्वरं जयेत् ॥ ४५ ॥
कासं श्वासं तथा शोथं पाण्डुरोगं हलीमकम् ।
प्लीहानमग्रमांसं च यकृतं च विनाशयेत् ॥ ४६ ॥
पारा, गन्धक, लोहा, ताम्रभस्म, रौप्यभस्म, सुवर्णभस्म, हरताल, खपरिया, काँसा, वङ्ग, मूंगा, मोती और स्वर्णमाक्षिककी भस्म, हीराकासीस, मैनसिल, सुहागा और कपूर इन सबको समानभाग लेकर एकत्र खरलकरके उसको भारंगी, अडूसा, निर्गुण्डी, पान, अरणी, करेला, पटोलपात, भाँग, पुनर्नवा और, अदरख इन ओषधियोंके रसमें क्रमसे सात सात बार भावना देकर एक एक
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