भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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सप्तभिर्मृत्तिकावस्त्रैर्वेष्टयित्वा पुटेल्लघु ।
रसतुल्यं लौहभस्म मृतवङ्गमहिस्तथा ॥ १२ ॥
मधूकसारजलदं रेणुकं गुग्गुलुं शिलाम् ।
चाम्पेयं च समांशं स्याद्भागाद्धं शोधितं विषम् ॥ १३ ॥
तत्सर्वं मर्दयेत्खल्ले भावयेद्विषनीरतः ।
आतपे सप्तधा तीव्रे मर्दयेद्घटिकाद्वयम् ॥ १४ ॥
चिरचिटेकी जड और चीतेकी जडकी छालको समानभाग लेकर बारीक चूर्ण करके जलके साथ पीस लेवे, फिर कपडेमें बाँधकर उसका रस निचोड लेवे। पश्चात् पारा, गन्धक, अभ्रक, वत्सनाभ, सुहागा और हरताल इन सबको उक्त रसके बराबर लेकर उसीरसमें सात दिनतक खरल करे। फिर तीन दिनतक गुसलीके क्वाथमें भावना देकर धूपमें सुखालेवे। इसके पश्चात् इसको गोस्तनाका-रवाली मूषामें रखकर मूषाका अच्छे प्रकार मुख बन्द करके उसपर सातवार कपरोटी करे और सुखाकर लघुपुटमें पकावे। स्वांगशीतल होनेपर औषधिको निकालकर चूर्ण करलेवे पश्चात्, लोहभस्म, वंगभस्म, अफीम, महुएका सार, नागरमोथा, रेणुका, गूगल, मैनसिल और नागकेसर ये प्रत्येक ओषधि पारेके बराबर भाग तथा शुद्धवत्सनाभ पारेसे आधा भाग लेकर सबको एकत्र मिलाकर उत्तम प्रकारस खरल करे ॥ ९–३१४ ॥
कटुत्रयकषायेण कनकस्य रसेन च ।
फलत्रयकषायेण मुनिपुष्परसेन च ॥ १५ ॥
समुद्रफेननीरेण विजयापत्रवारिणा ।
चित्रकस्य कषायेण ज्वालामुख्या रसेन च ॥
प्रत्येकं सप्तधा भाव्यं तद्वत्पित्तैश्च पंचभिः ॥ १६ ॥
सर्वस्य समभागेन विषेण परिधूपयेत् ।
विमर्द्य भक्षयित्वा च रक्षयेत्कूपिकोदरे ॥ १७ ॥
फिर सिंगिया विषके क्वाथमें सातवार भावना देकर दो घड़ीतक धूपमें रखकर घोटे। पश्चात् त्रिकुटा, धतूरा, त्रिफला, अगस्तियाके फूल, समुद्रफेन, भाँग, चीता और कलिहारी इन समस्त ओषधियोंके रस वा क्वाथोंमें और पांचों पित्तोंमें क्रमसे सात-सात दिनतक पृथक् पृथक् भावना देवे। फिर उसमें सम्पूर्ण ओषधिके समा-नभाग शुद्ध मीठातेलिया मिलाकर खूब बारीक खरल करके पश्चात् इस