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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 171 of 1416

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Page 171

प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । १३९


तत्तुल्यसूतं द्विगुणं च गन्धं तुत्थं च गन्धेन समानभागम् ।
निम्बूत्थतोयेन विमर्द्य सर्वं गोलं प्रकृत्याथ मृदा विलिप्य ॥ ६
पुटं च दत्त्वाथ विमर्द्य चैनं गन्धेन तुल्येन कृशानुनीरैः ।
विषं च दत्त्वाथ कलाप्रमाणमीषत्कृशानूत्थरसैः पचेत्तत् ॥ ७ ॥
पित्तैस्तथा भावित एष सूतस्त्रिदोषदावानलकालमेघः ।
वल्लं ददीतास्य च पूर्वयुक्त्या दाहोत्तरे तं मधुपिप्पलीभिः ॥
मुद्गश्च शाल्यन्नमिह प्रशस्तं पथ्यं भवेत्कोष्णमिदं दिनान्ते ॥ ८

हरतालके द्वारा कीहुई वंगभस्म, मैनासिलके द्वारा कीहुई सीसेकी भस्म, पारेके द्वारा की हुई स्वर्णभस्म, ताँबेकी भस्म और चाँदीकी भस्म, गन्धकके द्वारा कीहुई लोहभस्म इन सबको समानभाग लेकर एकत्र मिश्रित करके पश्चात् उसको सिंग-रफके द्वारा पुटपाक विधिसे पकावे फिर उसमें पारा एकभाग, गन्धक २ भाग और तूतिया २ भाग मिलाकर बिजौरेंनींबूके रसमें खरल करके गोला बनालेवे फिर उस गोलेको सम्पुटमें बन्द करके ऊपरसे कपरोटी कर पुटपाक करे । स्वांगशीतल होनेपर गोलिको निकालकर खरल करलेवे । फिर उसमें समानभाग गन्धक मिला-कर चीतेके रसमें घोटे, पश्चात् गन्धकका १६ वां भाग शुद्ध वत्सनाभ मिलाकर और थोड़ासा चीतेका रस डालकर कुछ देरतक पाक करे । पश्चात् उपर्युक्त पाँचों पित्तोंमें पृथक् पृथक् भावना देकर दो दो रत्तीकी गोलियां बनालेवे । इस प्रकार यह त्रिदोषदावानलकालमेघरस सिद्ध होता है । इसकी एक एक गोली पूर्वोक्त विधिके अनुसार मधु और पीपलके चूर्णके साथ दाहयुक्तज्वरमें सेवन करावे और अपराह्नकालमें रोगीको मूँगके यूष और शालिचावलोंके भातका मन्दोष्ण पथ्य देवे ॥ ६-८ ॥

श्रीप्रतापलंकेश्वररस ।

अपामार्गस्य मूलानां चूर्णं चित्रकमूलजैः ।
वल्कलैर्मर्दयित्वाऽथ रसं वस्त्रेण गालयेत् ॥ ९ ॥
तेन सूतसमं गन्धमभ्रकं पारदं विषम् ।
टङ्कणं तालकं चैव मर्दयेद्दिनसप्तकम् ॥ ३१० ॥
त्रिदिन मुसलीकन्दैर्भावयेद्धर्मरक्षितम् ।
मूषां च गोस्तनाकारामापूर्योपरि ढक्कयेत् ॥ ३११ ॥