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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 170 of 1416

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Page 170

१३८ भैषज्यरत्नावली । [ रस-

वातश्लेष्मणि मन्देऽग्नौ पित्तश्लेष्माधिकेऽपि च ।
त्रिदोषजनिते घोरे कासे श्वासे क्षये तथा ॥ १ ॥

रससिन्दूर, अभ्रक, सुहागा, सोंठ, कस्तूरी, पीपल, दन्तीकी जड, भाँगके बीज कपूर और मिरच इन सबको समान भाग लेकर अदरखके रसमें सात बार मर्दन करके दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । इनमेंसे एक एक गोली अदरखके स्वरसके साथ सेवन करनेसे वात और कफके विकार, मन्दाग्नि, पित्त और कफकी अधिकता और त्रिदोषजनित भयंकर ज्वर तथा खाँसी, श्वास और क्षयादिरोग दूर होते हैं ॥ ९९-३०१ ॥

अर्कमूर्त्ति, त्रिदोषदावानलरस ।

लौहाष्टकं मारितमर्कभागं सूतं द्विभागं द्विगुणं च गन्धम् ।
विमर्दयेद्वह्निरसेन तापे दिनत्रयं चात्र विषं कलांशम् ॥ २ ॥
निक्षिप्य पित्तैः परिभावितोऽयं रसोऽर्कमूर्तिर्भवति त्रिदोषे ।
ताम्रस्य पात्रे तु दिनैकमात्रं निम्बूरसेनापि च पित्तवर्गैः ॥ ३ ॥
क्षुद्रार्द्रकोत्थेन रसेन सूतस्त्रिदोषदावानल एष सिद्धः ।
गुञ्जाद्वयं त्र्यूषणयुक्तमस्य ददीत चित्रार्द्ररसेन वापि ॥
नासापुटे चापि नियोजनीया गुञ्जाऽस्य शुण्ठीमरिचेन युक्ता ४

लोहभस्म १ तोला, लोहेका आठवां भाग तथा ताम्रभस्म और पारा दो तोले तथा गन्धक ४ तोले लेकर सबको एकत्र चीतेके रसमें तीनदिनतक खरल करे और प्रतिदिन धूपमें सुखाताजाय, फिर उसमें समस्त औषधिसे १६ वाँ भाग शुद्ध मीठा-तेलिया मिलाकर पाँचों पित्तोंकी पृथक् पृथक् भावना देवे । इसको अर्कमूर्त्तिरस कहते हैं । इसी औषधको यदि ताँबेके पात्रमें डालकर नींबूके रसमें, पाँचों पित्तोंमें, कटेरीके क्वाथ और अदरखके रसमें क्रमसे एक एक दिनतक भावना दीजाय तो यही त्रिदोषदावानलरस सिद्ध होजाता है । इस रसको दो दो रत्ती परिमाण लेकर त्रिकुटेके चूर्ण और अदरखके तथा चीतेके रसमें मिलाकर सेवन करावे अथवा इस रसको एक रत्ती परिमाण लेकर सोंठ और मिरचोंके चूर्णमें मिलाकर नस्य देवे तो सन्निपातज्वर नष्ट होता है । उक्त दोनों रसोंकी मात्रा और सेवनविधि एकही प्रकार की है ॥ २-४ ॥

त्रिदोषदावानलकालमेघ ।

तालेन वङ्गं शिलया च नागं रसैः सुवर्णं रवितारपत्रम् ।
गन्धेन लौहं दरदेन सव पुटे मृतं योजय तुल्यभागम् ॥ ५ ॥