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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 169 of 1416

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Page 169

प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । १३७

मृतं कान्तं पलं देयं हेमसारं द्विकार्षिकम् ।
रसभस्म लवङ्गं च जातिकाफलमेव च ॥ ९४ ॥
वक्ष्यमाणौषधैर्भाव्यं प्रत्येकं दिनसप्तकम् ।
द्रोणपुष्परसैर्वापि नागवल्ल्या रसेन च ॥
द्विचन्द्रस्त्रिकटुर्देयो यत्नतो वटिकां चरेत् ॥ ९५ ॥
वंगभस्म, खपरिया भस्म, स्वर्णभस्म, कस्तूरी और रौप्यभस्म ये प्रत्येक एक एक तोला, कान्तलोहभस्म ४ तोले एवं सोनामाखीकी भस्म, रससिन्दूर, लौंग और जायफल ये प्रत्येक दो दो तोले लेवे। सबको एकत्र खरल करके द्रोणपुष्पी (गूमा) के पत्तोंके रसमें और पानोंके रसमें क्रमसे सात सात दिनतक भावना देवे । फिर उसमें कपूर और त्रिकुटा (सोंठ, मिरच, पीपल) ये प्रत्येक ओषधि चार-चार तोले मिलाकर उत्तमप्रकारसे खरल करके दो दो रत्तीकी गोलियाँ बना लेवे॥९३-३९

वातात्मके सन्निपाते महाश्लेष्मगदेषु च ।
त्रिदोषजनिते घोरे सन्निपाते सुदारुणे ॥ ९६ ॥
नष्टगर्भे नष्टशुक्र प्रमेहे विषमज्वरे ।
कासे श्वासे क्षये गुल्मे महाशोथे महागदे ॥ ९७ ॥
युवतीनां शतं गच्छेत्र च शुक्रक्षयो भवेत् ।
रोगान्सर्वान्निहन्त्याशु भास्करस्तिमिरं यथा ॥ ९८ ॥
इस रसको वातोल्बण सन्निपात, अत्यन्तप्रबल कफके विकार, त्रिदोषजनित भयंकर सन्निपात, नष्टगर्भ, शुक्रक्षय, प्रमेह, विषमज्वर, खाँसी, श्वास, क्षय, गुल्म-रोग, अत्यन्त शोथ और अन्यान्य भयंकर रोगोंमें प्रयोग करना चाहिये। इसके सेवन करनेपर सैकड़ों स्त्रियोंके साथ रमण करनेपर भी वीर्य क्षीण नहीं होता। यह रस जैसे सूर्योदयके होनेपर अन्धकार नष्ट होजाता है, उसी प्रकार उक्त समस्त रोगोंको शीघ्र नष्ट कर देता है ॥ ९६-९८ ॥

कस्तूरीभूषणरस ।
रसाभ्र टङ्कण शुण्ठी कस्तूरी पिप्पली तथा ।
दन्तीमूलं जयाबीजं कर्पूरं मरिचं समम् ॥ ९९ ॥
आर्द्रकस्वरसेनैव मर्दयेत् सप्तवारकम् ।
आर्द्रकस्वरसैर्युक्तं योजयेद्रक्तिकाद्वयम् ॥ १०० ॥