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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 142 of 1416

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Page 142

११० भेषज्यरत्नावली । [ रस-

मृतोत्थापनरस ।

शुद्धसूतं द्विधा गन्धं शिला च विषहिङ्गुलम् ।
मृतकान्ताभ्रताम्रायस्तालकं माक्षिकं समम् ॥ २८ ॥
अम्लवेतसजम्बीरचाङ्गेरीणां रसेन च ।
निर्गुण्डीहस्तिशुण्डयोश्च द्रवैर्मर्द्यं दिनत्रयम् ॥ २९ ॥
रुद्ध्वा तु भूधरे पाच्यं दिनान्ते तत्समुद्धरेत् ।
चित्रकस्य कषायेण मर्दयेत्प्रहरद्वयम् ॥ ३० ॥
माषमात्रं प्रदातव्यं हिङ्गुव्योषार्द्रकद्रवैः ।
सकर्पूरानुपानं स्यान्मृतस्योत्थापने रसे ॥ ३१ ॥
पीडितं सन्निपातेन गतं वापि यमालयम् ।
तत्क्षणाज्जीवयत्येष पथ्यं क्षीरैः प्रयोजयेत् ॥ ३२ ॥

शुद्ध पारा एकभाग, शुद्ध गन्धक दो भाग एवं मैनसिल, शोधित वत्सनाभ, सिंगरफ, अभ्रकभस्म, ताम्रभस्म, लोहभस्म, हरताल और स्वर्णमाक्षिककी भस्म इन सब औषधियोंको एकएक भाग लेकर सबको एकत्र मिश्रित करके अम्लवेंत जम्बीरीनिंबू, चूका, निर्गुण्डी और हाथीशुण्डी इन प्रत्येकके रसमें क्रमसे तीन तीन दिनतक खरल करके घडिय़ामें रखकर फिर एकदिनतक भूधरयन्त्रमें पकावे, उत्तम प्रकारसे पकजानेपर औषधिको निकालकर चीतेकी जडके काढेमें दो प्रहरतक खरल करे इसकी मात्रा एक उडदके बराबर देनी चाहिये और इस तरह ऊपरसे हींग सोंठ, मिरच, पीपल, अदरखका रस और कपूरका जल इनका अनुपान करना चाहिये । यह रस सन्निपातज्वरसे पीडित और मृतप्राय व्यक्तिको भी तत्काल जीवित करता है । इसपर दूधका पथ्य देवे ॥ २८-३२ ॥

मृतसंजीवनरस ।

शुद्धसूतं द्विधा गन्धं खल्ले तत्कज्जलीकृतम् ।
अभ्रलौहकयोर्भस्म ताम्रभस्म समं समम् ॥ ३३ ॥
विषतालवराटी च शिलाहिङ्गुलचित्रकम् ।
हस्तिशुण्डी चातिविषा त्र्यूषणं हेममाक्षिकम् ॥ ३४ ॥
चूर्णं विमर्दयेद्रावैराद्रकस्य दिनत्रयम् ।
निर्गुण्डीविजयाद्रावैस्त्रिदिनं मर्दयेत्पुनः ॥ ३५ ॥