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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

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Page 141

प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । १०९

यूष, तक्र और भातका यथेच्छरूपसे पथ्य देवे ॥ १८-१२० ॥
आनन्दभैरवीवटी ।
विषं त्रिकटुकं गन्धं टङ्कणं मृतशुल्बकम् ।
धत्तूरस्य च बीजानि हिङ्गुलं नवमं स्मृतम् ॥ २१ ॥
एतानि समभागानि दिनैकं विजयारसैः ।
मर्दयेच्चणकाभा तु वटिकाऽऽनन्दभैरवी ॥ २२ ॥
भक्षयित्वा पिबेच्चानु रविमूलकषायकम् ।
सव्योषं हन्ति नो चित्रं सन्निपातं सुदारुणम् ॥ २३ ॥

शुद्ध वत्सनाभ, सोंठ, मिरच, पीपल, गन्धक, सुहागा, तांबेकी भस्म, धतूरेके बीज और सिंगरफ इन सबको समान भाग लेकर एक दिनतक भांगके रसमें घोटकर चनेकी बराबर गोलियाँ बनालेवे। इनको आनन्दभैरवीवटी कहतेंहैं। इनमेंसे एक गोली खाकर ऊपरसे त्रिकुटेका चूर्ण मिलाकर आककी जडका काढा पीवे तो दारुण सन्निपातज्वर दूर होताहै ॥ २१-२३ ॥

त्रैलोक्यसुन्दररस
रसगन्धकयोर्माषौ प्रत्येकं कज्जलीकृतौ ।
शक्रं च मुसली चैव धत्तूरः केशराजकम् ॥ २४ ॥
देवदाली जयन्ती च तथा मण्डूकपर्णिका ।
एषां पत्ररसैः शाणैः शिलायां खल्लयेत्पुनः ॥ २५ ॥
शोषयित्वा वटी कार्या त्वनेका राजिकोपमा ।
त्रिदोषजं ज्वरं हन्ति तथा प्रबलकोष्ठकम् ॥ २६ ॥
तप्त तु नारिकेलस्य जलं देयं प्रयत्नतः ।
त्रैलोक्यसुन्दरो नाम सन्निपातहरो रसः ॥ २७ ॥

पारा और गंधक प्रत्येक दो दो माशे लेकर कज्जली करलेवे। फिर उसको कुडेकी छाल, मुसली धत्तूरा, कुकुरभांगरा, बंदाल, अरणी और मण्डूकपर्णी इन औषधियोंके पत्तोंके चार चार माशे रसके साथ पत्थरके खरलमें खूब खरल करके सरसोंके बराबर गोलियाँ बनाकर सुखालेवे. यह त्रैलोक्यसुन्दररस सेवन करनेसें कोष्ठगत त्रिदोषज्वर और सब प्रकारके सन्निपातज्वर दूर होते हैं। इसके सेवन करनेसे यदि रोगीको गरमी मालूम होवे तो नारियलका जल पीनेको देना चाहिये ॥ २४-२७ ॥