भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in context१०८ . | भैषज्यरत्नावली । | [ रस-
गोलियाँ बनालेवे । ये गोलियाँ साध्य और असाध्य तेरहों प्रकारके सन्निपातज्वरोंको शीघ्र नष्ट करती हैं ॥ १४ ॥ १५ ॥
द्वितीय चक्री ।
शम्भोः कण्ठविभूषणं समरिचं तालं तथा पारदं
देवीबीजयुतं सुशोधितमितं जैपालबीजोत्तमम् ।
दन्तीमूलयुतं समागधिफलं सर्वं समांशं नयेत्
तत्सर्वं परिमर्द्य चार्द्रकरसैर्गुञ्जाप्रमाणं रसम् ॥ १६ ॥
दद्याद् घोरतरे त्रयोदशविधे दोषे च चक्रयाह्वयं
तन्द्रादाहसमन्विते च तृषया सम्पीड़िते मानवे ॥१७॥
शुद्ध वत्सनाभ विष, मिरच, हरताल, पारा और गन्धककी कज्जली, शुद्ध जमाल-गोटे, दन्तीकी जड और पीपल इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर अदरखके रसमें खरलकरके एक एक रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । अत्यन्त उग्र तेरहोंप्रकारके सन्निपातज्वर, दोषोंकी उल्बणता, तन्द्रा, दाह और तृषायुक्त ज्वरमें भी यह रस रोगीको सेवन कराना चाहिये । इसके सेवनसे उक्त सब विकार शान्त होतेहैं ॥ १६ ॥ १७ ॥
ब्रह्मरन्ध्ररस ।
रसाभ्रगन्धकं तालं हिङ्गुलं मरिचं तथा ।
टङ्कणं सैन्धवोपेतं सर्वांशममृतं तथा ॥ १८ ॥
सर्वपादसमोपेतं महिषीपित्तमर्दितम् ।
ब्रह्मरन्ध्रे प्रयोक्तव्यं संन्यासज्ञानसंगमे ॥ १९ ॥
सहस्रकलशैः स्नानं लेपनं चन्दनादिभिः ।
इक्षुमुद्गरसं भोज्यं तक्रभक्तं यथेप्सितम् ॥ १२० ॥
पारा और गन्धककी कज्जली दो भाग, अभ्रक, हरताल, सिंगरफ, मिरच, सुहागा और सेंधानमक ये प्रत्येक औषधि एक एक भाग और शुद्ध वत्सनाभ सबके बराबर भाग लेवे । इन समस्त ओषधियोंसे चौथाई भाग भैंसका पित्त लेकर उसमें इन सबको खूब अच्छेप्रकारसे खरल करके सन्निपातज्वरकी अज्ञानावस्थामें रोगीके ठीक ब्रह्मरन्ध्रकी जगह मस्तकमें अस्त्रद्वारा बडी सावधानीसे किंचित् क्षत करके उसमें इस रसको भरदेवे । इसके पश्चात् रोगीको शीतल जलसे हजार कलशोंसे स्नान करावे और उसके शरीरपर चन्दन आदिका लेप करे और इसपर ईखका रस, मूंगका