Skip to content
SarvaKosh
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 139 of 1416

Read in context
Page 139

प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । १०७

जिन मनुष्योंका समस्त शरीर अत्यन्त शीतल हो और जिसको अधिक पसीना आनेसे देह अत्यन्त आर्द्र होजाताहो घोर निद्रा हो और सम्पूर्ण इन्द्रियोंसहित मन विमुग्ध होगया हो, ऐसे मनुष्योंको इस औषधिकी एक एक गोली उपयुक्त अनुपानके साथ सेवन करावे । यह सौभाग्यवटी शूल, श्वास, कफ, खाँसी, मूर्च्छा, अरुचि, तृषा आदि उपद्रवोंसहित सन्निपात ज्वरको दूर करके रोगीको मृत्युके मुखसे बचाकर नवजीवन प्रदान करती है ॥ ११० ॥

श्रीवेतालरस ।

रसं गन्धं विषं चैव मरिचालं समांशकम् ।
मर्दयेच्छ्लया तावद्यावज्जायेत कज्जलम् ॥ ११ ॥
गुञ्जामात्राप्रमाणेन हरेद् द्वादशसंज्ञकम् ।
साध्यासाध्यं निहन्त्याशु सन्निपातं सुदारुणम् ॥ १२ ॥
म्लानेषु लिप्तदेहेषु मोहग्रस्तेषु देहिषु ।
दातुमर्हति वेतालो यमदूतनिवारकः ॥ १३ ॥

शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, शुद्ध मीठा तेलिया, मिरच और हरताल ये सब औषधियाँ समान भाग लेकर प्रथम पारे और गन्धककी कज्जली करले, फिर सबको एकत्र मिलाकर पत्थरके खरलमें जलके साथ इतना घोटे कि, घुटते २ औषधि काजलके समान काली और चिकनी होजाय । फिर उसकी एकएक रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । इन गोलियोंके सेवन करनेसे साध्य व असाध्य बारह प्रकारका दारुण सन्निपात शीघ्र नष्ट होता है । रोगीके शरीरमें अधिक ग्लानि होनेपर तथा पसीनेके आनेसे आर्द्रता होनेपर और अत्यन्त मोह बेहोशीके होनेपर भी यह रस देना चाहिये यह वेतालरस यमदूतको भी निवारण करनेवाला है ॥ ११-१३ ॥

चक्री ।

रसं गन्ध विषं चैव धत्तूरं मरिचं तथा ।
शोधितं च तथा तालं माक्षिकं च समांशकम् ॥ १४ ॥
दन्तीक्वाथेन सम्भाव्य गुञ्जामात्रा तु चक्रिका ।
साध्यासाध्यान्त्रिहन्त्याशु सन्निपाताँस्त्रयोदश ॥ १५ ॥

पारे और गन्धककी कज्जली, शुद्ध वत्सनाभ, धतूरेके बीज, मिरच, शुद्ध हरताल और सोनामाखी सबको समान भाग ले दन्तीके काढेमें खरल करके एकएक रत्तीकी