भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in contextप्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । १०१
ज्वरविच्छेदकाले च सितया सह योजयेत् ।
द्वित्रगोलीप्रयोगेण ज्वरशान्तिर्न संशयः ॥ ८२ ॥
सीसेकी भस्म, रससिन्दूर हरताल और शुद्ध वत्सनाभ इन सबको समान भाग लेकर जलके साथ एकत्र खरल करके सरसोंके बराबर गोलियाँ बनालेवे. ज्वरके उतरजानेपर एक दिनमें दो तीन गोलियाँ मिश्रीके साथ देनेसे ज्वर शमन होता है ॥ ८१ ॥ ८२ ॥
रत्नगिरिरस ।
शुद्धसूतं समं गन्धंमृतताम्राभ्रहाटकम् ।
प्रत्येकं सूततुल्यं स्यात्सूताद्धं मृतलोहकम् ॥ ८३ ॥
लौहार्द्धं मृतवैक्रान्तं मर्दयेद्भृङ्गजद्रवैः ।
पर्पटीरसवत् पाच्यं चूर्णितं भावयेत्पृथक् ॥ ८४ ॥
शिग्रूवासकनिर्गुण्डीवचाग्निभृङ्गमुण्डिकैः।
क्षुद्रामृताजयन्तीभिर्मुनिब्राह्मीसुतिक्तकैः ॥ ८५ ॥
कन्यायाश्च द्रवैर्भाव्यं प्रतिवारं त्रिधा त्रिधा ।
रुद्ध्वा लघुपुटे पाच्यं वालुकायन्त्रमध्यगम् ॥ ८६ ॥
यन्त्रं निरुध्य यत्नेन स्वाङ्गशीतं समुद्धरेत् ।
चूर्णं नवज्वरे देयं माषमात्रं रसस्य वै ॥ ८७ ॥
कृष्णाधान्यसमायुक्तं मुहूर्तान्नाशयेज्ज्वरम् ।
अयं रत्नगिरिर्नाम रसो योगस्य वाहकः ॥ ८८ ॥
शुद्ध पारा और शुद्ध गन्धककी कजली दो दो तोले, ताम्रभस्म, अभ्रकभस्म और स्वर्णभस्म ये प्रत्येक एक एक तोला, लोहभस्म ६ माशे और वैक्रान्त मणिकी भस्म ३ माशे लेवे । सबको एकत्र भाँगरेके रसमें खरल करके पर्पटीके समान पाक करे । फिर उसका चूर्ण करके उसको सहिंजना, अडूसा, निर्गुण्डी, वच, चीता, भाँगरा, गोरखमुण्डी, कटेरी, गिलोय, अरणी, अगस्तियाके फूल, ब्राह्मी, चिरायता और घीकुँवार इन प्रत्येकके रसमें क्रमसे पृथक् २ तीन तीन बार भावना देवे, पश्चात् एक उत्तम मूषामें बन्द करके वालुकायन्त्रमें रखकर लघुपुटमें पकावे, स्वांगशीतल होनेपर मूषामेंसे औषधिको निकालकर बारीक चूर्ण करलेवे, इस रसको नवीनज्वरमें एक माशा परिमाण दिनमें तीनबार पीपल तथा धनियेके क्वाथके अनुपानके साथ सेवन करावे । यह रस ज्वरको क्षणभरमें नष्ट करदेता है और योगवाही होनेसे भिन्नभिन्न