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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 134 of 1416

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Page 134

१०२ | भैषज्यरत्नावली । | [ रस-

अनुपानोंके साथ सेवन करनेसे सम्पूर्ण रोगोंमें हितकारी है ॥ ८३-८८ ॥

प्रतापमार्त्तण्डरस ।

विषहिङ्गुलजैपालटङ्कणं क्रमवर्द्धितम् ।
रसः प्रतापमार्त्तण्डः सद्यो ज्वरविनाशनः ॥ ८९ ॥

शुद्ध वत्सनाभ १ भाग, सिंगरफ २ भाग, जमाल गोटा ३ भाग और सुहागा ४ भाग इन चारोंको जलके साथ एकत्र मर्दन करके दो-दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । इसको सेवन करनेसे ज्वर शीघ्र दूर होता है ॥ ८९ ॥

चण्डेश्वररस ।

रसं गन्धं विषं ताम्रं मर्दयेदेकयामकम् ।
आर्द्रकस्वरसेनैव मदयेत्सप्तवारकम् ॥ ९० ॥
निर्गुण्ड्याः स्वरसे पश्चान्मर्दयेत्सप्तवारकम् ।
गुञ्जैकार्द्ररसेनैव दत्तो हन्ति ज्वरं क्षणात् ॥ ९१ ॥
वातजं पित्तजं श्लैष्मं द्विदोषजमपि क्षणात् ।
सुशीतलजले स्नान तृषार्त्ते क्षीरभोजनम् ॥ ९२ ॥
आम्रं च पनसं चैव चन्दनागुरुलेपनम् ।
एतत्समो रसो नास्ति वैद्यानां हृदयङ्गमः ॥
एष चण्डेश्वरो नाम सर्वज्वरकुलान्तकृत् ॥ ९३ ॥

शुद्धपारा, शुद्धगन्धक, शुद्ध मीठा तेलिया और ताम्रभस्म सबको समान भाग लेकर प्रथम पारे और गन्धककी कज्जली करलेवे, फिर उसमें अन्य औषधियोंको मिलाकर एक प्रहरतक खरल करे । पश्चात् अदरखके स्वरसमें सातवार और फिर निर्गुण्डीके रसमें सातवार भावना देकर एक एक रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । इस रसकी एक एक गोली अदरखके रस और मधुके साथ देनेसे वातज, पित्तज, श्लैष्मिक और द्विदोषजनितज्वर तत्काल नष्ट होता है । इसके सेवन करनेपर यदि गरमी अधिक मालूम हो तो शितिल जलसे स्नान करना चाहिये और रोगीके क्षुधा और तृषासे व्याकुल हानपर दूध भात, शीतलजल, आम, कटहल आदि पदार्थ सेवन कराने चाहिये तथा चन्दन, अगर आदिका शरीरपर लेप करना चाहिये । वैद्योंको इस रसके समान अन्य कोई रस प्रिय नहीं है । यह चण्डेश्वरनामक रस सब प्रकारके ज्वरोंको समूल नष्ट करता है ॥ ९०-९३ ॥