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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 132 of 1416

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Page 132

१०० | भैषज्यरत्नावली । | [ रस-

माषैकश्च रसो देयस्तत्क्षणानाशयेज्ज्वरम् ॥
ज्वरे शान्ते परं पथ्यं देयं मुद्गौदनं पयः ॥ ७८ ॥

पारा, गन्धक, हरताल और भिलावोंकी गिरी चारोंको सम भाग लेकर थूहरके दूधमें एकत्र खरल करके एक मिट्टीके पात्रमें भरकर उसके ऊपर मुद्रा करके दो प्रहरतक मन्द २ अग्नि देवे । सांगशीतल होनेपर औषधिको निकाल कर भाँगरा, गाँडरदूब और चीतेके रसमें क्रमसे एक एक दिन खरल करके भावना देवे फिर उसको बारीक पीसकर शीशीमें भरकर रखदेवे । चातुर्थिक ज्वरमें और दूसरे दिन आनेवाले ज्वरमें इस रसको एक एक माशा परिमाण प्रयोग करे, यह ज्वरको तत्काल नष्ट करता है । ज्वरके शान्त होनेपर मूँगका यूष, भात और दूधका पथ्य देना चाहिये ॥ ७४-७८ ॥

त्रैलोक्यडुम्बुररस ।

सूतार्कगन्धचपला जयपालतिक्ते
पथ्या त्रिवृच्च विषतिन्दुकजं समांशम् ।
सम्मर्द्य वज्रिपयसा मधुना द्विगुञ्ज-
स्त्रैलोक्यडम्बुररसोऽभिनवज्वरघ्नः ॥ ७९ ॥

पारा, ताँबा, गंधक, पीपल, जमालगोटे, कुटकी, हरड, निसोत और कुचला सबको समान भाग लेकर थूहरके दूधमें खरल करके दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे। इन गोलियोंको मधुके साथ सेवन करनेसे नवीन ज्वर नष्ट होता है ॥ ७९ ॥

गदमुरारि ।

रसबलिशिललौहव्योषताम्राणि तुल्या-
न्यथ सदरदनागं भागमेतत्प्रदिष्टम् ।
भवति गदमुरारिश्चास्य गुञ्जाद्वयं वै
क्षपयति दिवसेन प्रौढमामज्वराख्यम् ॥ ८० ॥

पारे और गन्धककी कज्जली दो तोले, मैनसिल, लोहभस्म, सोंठ, मिरच, पीपल ताँबा, सिंगरफ और सीसेकी भस्म ये प्रत्येक औषधि एक एक तोला लेकर सबको एकत्र जलके साथ खरल करके दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । इस रसको सेवन करनेसे शीघ्रही पुराना आमज्वर दूर होता है ॥ ८० ॥

ज्वरहरीवटी ।

सीसकं रससिन्दूर हरितालं विषं समम् ।
एकत्र मर्दयेत्सर्वं सर्षपाभां वटीं चरेत् ॥ ८१ ॥