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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 1284 of 1416

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Page 1284

१२५२ | भैषज्यरत्नावली । | [ योनिव्यापद्-


बुद्धिमान् वैद्य उत्तम प्रकारसे घृतको सिद्ध करे । जब घृत विधिपूर्वक पककर सिद्ध होजाय तब शीतल होजानेपर उसमें शुद्ध पारा, शुद्ध पुरानी अभ्रक और शुद्ध गंधक ये प्रत्येक दो दो तोले परिमाण एकत्र पीसकर एवं शहद ३२ तोले मिलादेवे। फिर सबको एकमएक करके काँचकी शीशीमें या मिट्टी आदिके पात्रमें भरकर रखदेवे ॥ ६७-७० ॥

पराशरमुनिः प्रीतिकरुणावारिधिर्मुदा ।
वन्ध्यामयविनाशाय शिशुकल्पद्रुमं घृतम् ॥
चकारास्य प्रसादेन जन्मवन्ध्या लभेत्सुतम् ॥ ७१ ॥
खादेत्कर्षद्वयं सर्पिर्दत्त्वा विप्राय सादरम् ।
अनुपानं प्रकुर्वीत पयश्छागं विशेषतः ॥ ७२ ॥
गव्यं वाऽपि पिबेत्क्षीरं शीतं पलयुगं तथा ।
घृतस्यास्य सुसिद्धस्य गुणाञ्छृणु समाहितः ॥ ७३ ॥

इस कुमारकल्पद्रुम घृतको करुणासागर श्रीपराशरमुनिने दया करके वन्ध्यास्त्रियोंके वन्ध्यात्वदोषको निवारण करनेके लिये निर्माण किया है। इस घृतके प्रभावसे जन्मकी वन्ध्यास्त्री पुत्रको उत्पन्न करती है । प्रथम दानमानादिसे ब्राह्मणोंको संमानपूर्वक पूजकर पश्चात् प्रतिदिन इस घृतको दो दो तोले प्रमाण लेकर सेवन करे और ऊपरसे बकरीका अथवा गौका शीतल दुग्ध ८ तोले परिमाण पान करे । अब इस सिद्ध घृतके गुणोंको कहते हैं सावधान होकर सुनो—॥

अस्य प्रसादात्षण्ढोऽपि वन्ध्यायां जनयेत्सुतम् ।
रजोदोषेण या दुष्टा शुक्रदोषेण योऽपि च ॥७४॥
स्त्री भगस्थगदेनैव पीडिता या च सर्वदा ।
या च पुष्पं न विन्देत ऋतुना पीडिता च या ॥७५॥
भूत्वा भूत्वा च नश्यन्ति मृतास्तासां मुहुर्मुहुः ।
अनेकौषधयोगेन मन्त्रयोगेन वा पुनः ॥ ७६ ॥
अनेकव्रतयोगेन यासां पुत्रो न जायते ॥
तासां कामसमाः पुत्राः जायन्ते चिरजीविनः ॥७७॥

इस घृतके प्रसादसे हिजड़ा पुरुषभी वन्ध्यास्त्रीमें पुत्र उत्पन्न कर सकता है । जो स्त्री रजोदोषसे या योनिरोगसे पीड़ित हो अथवा जो पुरुष वीर्यदोषसे