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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 1285 of 1416

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Page 1285

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १२५३

दुःखित हो जो स्त्री ऋतुमती न होती हो या जिसके ऋतुकालमें पीडा होती हो, जिसके बारंबार सन्तान होकर मरजाती हो वा मरीहुई हो तथा अनेक प्रकारकी औषधियोंके प्रयोगसे अथवा यन्त्र, मन्त्रादिके करनेसे और नाना प्रकारके कठिन व्रतादिकोंके करनेसेभी जिनके पुत्र उत्पन्न नहीं होता हो उनके इस घृतको पान करनेसे कामदेवकी समान और दीर्घायुषी पुत्र उत्पन्न होते हैं ॥

एतद् घृतं गृहे यस्य न तस्य कुलिशाद्भयम् ।
न राक्षसैः पिशाचैश्च गृह्यते तस्य बालकः ॥
नोपसर्पति सर्पोऽपि दर्पात्तस्य गृहान्तरम् ॥ ७८ ॥

जिसके घरमें यह घृत हो उसको वज्रसे भय नहीं करना चाहिये । उसका बालक राक्षस और पिशाचादिकोंसे ग्रसित नहीं होता एवं सर्पभी उसके घरमें भयसे प्रवेश नहीं करता ॥ ७८ ॥

इति भैषज्यरत्नावल्यां योनिव्यापच्चिकित्सा ।


लोमशातनविधिः ।

हरितालचूर्णकणिकालेपात्तप्तेन वारिणा सद्यः ।
निपतन्ति लोमनिचयाः कौतुकमिदमद्भुतं मन्ये ॥ १ ॥

हरिताल और चूनेको गरम पानीमें मिलाकर लेप करनेसे तत्काल बाल गिरजाते हैं । इसको मैं अद्भुत कौतुक मानता हूँ ॥ १ ॥

दग्ध्वा शङ्खं क्षिपेद्रम्भास्वरसे तच्च पेषितम् ।
तुल्यालं लेपनं हन्ति लोम गुह्यादिसम्भवम् ॥ २ ॥

शङ्खको दग्धकर उसकी भस्मको केलेके स्वरसमें डालकर और शंखभस्मकी बराबर हरितालका चूर्ण डालकर पीसकर लेप करनेसे गुह्यस्थानोंके बाल गिरजाते हैं ॥ २ ॥

रक्ताञ्जनपुच्छचूर्णयुक्तं तैलं तु सार्षपम् ।
सप्ताहमुषितं हन्ति मूलाद्रोमाण्यसंशयम् ॥ ३ ॥

लाल अञ्जनीकी पुच्छके चूर्णको सरसोंके तेलमें ७ दिनतक भिगोकर रक्खे । फिर उसको पीसकर लेप करनेसे जड़सहितबाल गिरजाते हैं ॥ ३ ॥