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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 1271 of 1416

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Page 1271

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १२३९

तण्डुलाम्बु त्वजाक्षीरं घृततुल्यं प्रदापयेत् ।
तथैव केशराजस्य प्रस्थमेकं भिषग्वरः ॥ ७१ ॥
जीवनीयैः पियालैस्तु परुषैः सरसाञ्जनैः ।
यष्ट्याह्वाशोकमूलं च मृद्वीका च शतावरी ॥ ७२ ॥
तण्डुलीयकमूलं च कल्कैरेभिः पलार्द्धकैः ।
शर्करायाः पलान्यष्टौ सिद्धशीते प्रदापयेत् ॥ ७३ ॥

अशोककी छालको एक प्रस्थ लेकर एक आढक जलमें पकावे। जब पकते हुए चौथाई भाग जल बाकी रहजाय तब उतारकर छानलेवे । फिर उस क्वाथके साथ घी एक प्रस्थ, जीरेका क्वाथ एक प्रस्थ, चावलोंका जल एक प्रस्थ, बकरीका दूध एक प्रस्थ और कुकुरभाँगरेका रस एक प्रस्थ तथा जीवनीयगणकी औषधियें, चिरौंजी, फालसे, रसौत, मुलहठी, अशोककी जडकी छाल, दाख शतावर और चौलाईकी जड इन सब औषधियोंके दो दो तोले कल्कको मिलाकर यथारीति घृत को पकावे । जब अच्छे प्रकार पककर सिद्ध होजाय तब नीचे उतारकर शीतल होजानेपर उसमें ८ पल चीनी मिलादेवे ॥ ७०-७३ ॥

पीतमेतद् घृतं हन्ति सर्वदोषसमुद्भवम् ।
श्वेतं नीलं तथा कृष्णं प्रदरं हन्ति दुस्तरम् ॥ ७४ ॥
कुक्षिशूलं कटीशूलं योनिशूलं च सर्वगम् ।
मन्दाग्निमरुचिं पाण्डुं कृशतां श्वासकासकम् ॥ ७५ ॥
आयुःपुष्टिकरं बल्यं बलवर्णप्रसादनम् ।
देयमेतत्परं सर्पिर्विष्णुना परिकीर्त्तितम् ॥ ७६ ॥

इस घृतको पीतेही सम्पूर्ण दोषोंसे उत्पन्न हुआ श्वेतप्रदर नीलप्रदर तथा दुस्तर कृष्णप्रदर नष्ट होता है । यह घृत कुक्षिशूल, कटिशूल, सर्व प्रकारके योनिशूल, मन्दाग्नि, अरुचि, पाण्डुरोग कृशता, श्वास, खाँसी प्रभृति विकारोंको नष्ट करता है । एवं आयुवर्धक, पुष्टिकार, बल और वर्णको उत्पन्न करनेवाला है । इस घृतको श्रीविष्णुभगवान्ने रचा है ॥ ७४-७६ ॥

अशोकारिष्ट ।

अशोकस्य तुलामेकां चतुर्द्रोणे जले पचेत् ।
पादशेषे रसे पूते शीते पलशतद्वयम् ॥ ७७ ॥
दद्याद् गुडस्य धातक्याः पलषोडशिकं मतम् ।
अजाजीं मुस्तकं शुण्ठीं दार्वीमुत्पलफलत्रिकम् ॥ ७८ ॥