भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in context१२३८ भैषज्यरत्नावली । [ प्रदररोग-
अङ्गदाहं योनिदाहमक्षिकुक्षिभवं च यम् ॥ ६४ ॥
मन्ददृष्टिमश्रुपातं तिमिरं वातसम्भवम् ।
आध्मानानाहशूलघ्नं वातपित्तप्रकोपजित् ॥ ६५ ॥
अम्लपित्तं च पित्तं च योनिरोगं विनाशयेत् ।
दृष्टिप्रसादजननं बलवर्णाग्निकारकम् ॥ ६६ ॥
यह न्यग्रोधाद्यनामक घृत शरीरमें पहुँचकर अमृतके समान गुण करता है । तथा स्त्रियोंके दुस्तर नीलप्रदर, लालप्रदर, श्वेतप्रदर, कृष्णप्रदर, योनिशूल, कुक्षिशूल, दुस्सह वस्तिशूल, अङ्गोंकी दाह, योनिदाह, नेत्रदाह, कुक्षिदाह, दृष्टिकी हीनता, अश्रुपात, वातज तिमिररोग, आध्मान, आनाह ( अफारा ) शूल, वातपित्तजन्य रोग, अम्लपित्त, पित्त और योनिरोगको शीघ्र नष्ट करता है एवं दृष्टिको प्रसन्न, बल, वर्ण और अग्निकी वृद्धि करता है ॥ ६३-६६ ॥
विश्ववल्लभघृत ।
केशराजस्य निर्गुण्ड्याः शतावर्याः कुशस्य च ।
विदार्याः स्वरसेनापि च्छागेन पयसा तथा ॥ ६७ ॥
कल्कैर्दाडिमबिल्वाब्दैर्लवङ्गैलाफलत्रिकैः ।
महता पञ्चमूलेन द्राक्षाचन्दनचम्पकैः ॥ ६८ ॥
निशादारुनिशाभ्यां च वह्निना लवणैरपि ।
तोयपिष्टैः पचेत्सर्पिः पात्रे मृत्परिनिर्मिते ॥
विश्ववल्लभनामेदं घृतं स्त्रीगदसूदनम् ॥ ६९ ॥
कुकुरभाँगरा, निर्गुण्डी, शतावर, कुशा और विदारीकन्द इनके स्वरस तथा बकरीके दूधको एकएक प्रस्थ लेकर सबके साथ अनारका वक्कल, बेलगिरी नागरमोथा, लौंग, इलायची, त्रिफला, बृहत्पञ्चमूल, दाख, लालचंदन, चम्पा वृक्षकी छाल, हल्दी, दारुहल्दी, चीतेकी जड और पाँचोंनमक इन सब औषधियोंको समान भाग मिश्रित एक सेर लेकर जलमें पीसकर यथाविधि मिश्रित करके घृतको पकावे । जब अच्छे प्रकारसे पकजाय तब मिट्टीके उत्तम पात्रमें भरकर रखदेवे । यह विश्ववल्लभनामक घृत स्त्रियोंके सब रोगोंको नष्ट करता है ॥
अशोकघृत ।
अशोकवल्कलं प्रस्थं तोयाढकविपाचितम् ।
पादस्थेन घृतप्रस्थं जीरकक्वाथसंयुतम् ॥ ७० ॥