भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in context१२४० भैषज्यरत्नावली । [ योनिव्यापद-
आम्रास्थि जीरकं वासां चन्दनं च विनिक्षिपेत् ।
चूर्णयित्वा पलांशेन ततो भाण्डे निधापयेत् ॥ ७९ ॥
मासादूर्ध्वं च पीत्वैनमसृग्दररुजां जयेत् ।
ज्वरं च रक्तपित्तार्शो मन्दाग्नित्वमरोचकम् ॥
मेहशोथारुचिहरस्त्वशोकारिष्टसंज्ञितः ॥ ८० ॥
अशोककी छालको १०० पल लेकर चार द्रोण ( १२८ सेर ) जलमें पकावे । जब पकते २ एक द्रोण ( ३२ सेर ) जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । फिर उस क्वाथमें शीतल होजानेपर २०० पल गुड, धायके फूल ६४ तोले एवं काला जीरा, नागरमोथा, सोंठ, दारुहल्दी, लालकमलकी जड, त्रिफला, आमकी गुठलीकी गिरी, जीरा, अडूसा और लालचन्दन इन सबको एक एक तोला लेकर और एकत्र कूटपीसकर डालदेवे । फिर उस पात्रके मुखको बन्द करके रखदेवे । एक महीनेके बाद उसको निकालकर और छानकर उपयुक्त मात्रासे दिनमें दो तीन बार पान करे तो यह अशोकारिष्ट सर्व प्रकारके प्रदररोग, ज्वर, रक्तपित्त, बवासीर मन्दाग्नि, अरुचि, प्रमेह, सूजन और इनके अतिरिक्त अन्यान्य सर्व प्रकारके रोगोंको शीघ्र हरता है ॥ ७७-८० ॥
प्रदरमें पथ्यापथ्यविधि ।
यत्पथ्यं यदपथ्यं च रक्तपित्तेषु कीर्त्तितम् ।
प्रदरेऽपि यथादोषं तत्तन्नारी भजेत्त्यजेत् ॥ ८१ ॥
रक्तपित्तरोगमें जो पथ्यपदार्थ वर्णन किये हैं उनको स्त्री प्रदररोगमें दोषानुसार सेवन करे और जो उक्त रोगमें अपथ्य कहे गये हैं उन सबको प्रदररोगमें भी त्यागदेवे ॥ ८१ ॥
इति भैषज्यरत्नावल्यां प्रदररोगचिकित्सा ।
योनिव्यापदकी चिकित्सा ।
योनिव्यापत्सु भूयिष्ठं शस्यते कर्म वातजित् ।
वस्त्यभ्यङ्गपरीषेकप्रलेपाः पिचुधारणम् ॥ १ ॥
योनिव्यापद्रोगमें वायुनाशक शीतलक्रिया तथा वस्तिक्रिया, तेलादिकी मालिश, सेचन, प्रलेप और पिचु ( फोया ) धारणादि उपचार करे ॥ १ ॥