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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 122 of 1416

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Page 122
९०भैषज्यरत्नावली ।[ रस-

स्वच्छन्दभैरवरसको भैरवाचार्यने निर्माण किया है । यह रस अत्यन्त भयंकर नवीन ज्वरको निस्सन्देह नष्ट करता है ॥ १५-१६ ॥

नवज्वरेभांकुश ।

सगन्धटङ्कं रसतालकं च विमर्द्य सम्भावय मीनपित्तैः ।
दिनद्वयं वल्लमितं प्रदद्याद् वृन्ताकतक्रौदनमेत्र पथ्यम् ॥
नवज्वरेभाङ्कुशनामधेयः क्षणेन घर्मोद्गममातनोति ॥ १७ ॥

सुहागा, गन्धक, पारा और हरताल इन चारोंको समानभाग लेकर एकत्र खरल करके रोहमछलीके पित्तेमें दो दिनतक भावना देवे. इस रसको एक एक अथवा दो दो रत्ती परिमाणमें दे और इसपर बैंगन, मट्ठा और भातका पथ्य देवे । इसके सेवनकरनेपर क्षणभरमें ही पसीना आकर ज्वर दूर हो जाता है । यह रस नवज्वररूपी हाथीके लिये अंकुशके समान है, इसलिये इसको नवज्वरेभांकुश कहते हैं ॥ १७ ॥

नवज्वरेभसिंह ।

शुद्धसूतं तथा गन्धं लौहं ताम्रं च सीसकम् ।
मरिचं पिप्पली विश्वं समभागानि कारयेत् ॥ १८ ॥
अर्द्धभागं विषं दत्त्वा मर्दयेद्वासरद्वयम् ।
शृङ्गवेराम्बुपानेन दद्याद् गुञ्जाद्वयं भिषक् ॥ १९ ॥
नवज्वरे महाघोरे धातुत्थे ग्रहणीग
नवज्वरेभसिंहोऽयं सर्वज्वरकुलान्तकृत् ॥ २० ॥

शुद्धपारा, शुद्धगन्धक, लोहभस्म, ताम्रभस्म, सीसेकी भस्म, मिरच, पीपल, और सोंठ ये प्रत्येक एक एक भाग और शुद्ध विष १।२ भाग लेकर सबको जलके योगसे दो दिनतक खरल करे । इस रसको घोर नवीनज्वर, धातुगतज्वर और संग्रहणी आदि रोगोंमें दो दो रत्तीकी मात्रासे अदरखके रस और मधुके साथ सेवन करना चाहिये । यह रस सर्वप्रकारके ज्वरोंको नाश करनेवाला है ॥ १८-२० ॥

नवज्वरहरवटी ।

रसगन्धौ विषं शुण्ठी पिप्पलीमरिचानि च ।
पथ्या विभीतकं धात्री दन्तीबीजं च शोधितम् ॥ २१ ॥
चूर्णमेषां समांशानां द्रोणपुष्पीरसैः पुटेत् ।
वटीं माषनिभां कुर्याद् भक्षयेत्तरुणज्वरे ॥ २२ ॥