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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 121 of 1416

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Page 121

प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । ८९

करना अत्यन्त हितकर है। यह शीतभंजीनामक रस सर्वप्रकारके ज्वरोंको समूल नष्ट करनेवाला है ॥ ८-१० ॥

तरुणज्वरारि ।
जैपालगन्धं विषपारदं च तुल्यं कुमारीस्वरसेन मर्द्यम् ।
अस्य द्विगुञ्जा हि सितोदकेन ख्यातो रसोऽयं तरुणज्वरारिः ॥
दातव्य एषोऽहनि पञ्चमे वा षष्ठेऽथवा सप्तम एव वापि ।
जाते विरेके विगतज्वरः स्यात् पटोलमुद्गाम्बुनिषेवणेन ॥ १२ ॥
जमालगोटा, गन्धक, शुद्ध मीठातेलिया और पारा सबको समानभाग लेकर घीग्वारके रसमें खरलकरके दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे। इनमेंसे एक एक गोली मिश्रीके शर्बतके साथ सेवन करनी चाहिये। इस रसको ज्वर आनेके पाँचवें, छठें अथवा सातवें दिन देना चाहिये। इसको सेवन करनेसे दस्त होकर ज्वर दूर हो जाता है। इसपर परवल और मूँगके यूषका पथ्य देना चाहिये ॥ ११-१२ ॥

स्वच्छन्दभैरव ।
ताम्रभस्म विषं हेम्नः शतधा भावितं रसैः ।
गुञ्जार्द्धं सन्निपातादिनवज्वरहरं परम् ॥ १३ ॥
आर्द्राकम्बुशर्करासिन्धुयुतः स्वच्छन्दभैरवः ।
इक्षुद्राक्षासितोर्वारु दधि पथ्यं रुजौ ददेत् ॥ १४ ॥
ताम्रभस्म और शुद्ध वत्सनाभ दोनोंको समान भाग लेकर धतूरेके रसमें सौवार भावना देकर आधी आधी रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे। इस स्वच्छन्दभैरव रसको अदरखके रस चीनी और सेंधानमकके साथ सेवन करनेसे नवीनज्वर और सन्निपातादिजन्यज्वर दूर होते हैं। इसपर रोगीको ईखका रस, दाख, मिश्री, ककड़ी और दही आदिका पथ्य देवे ॥ १३-१४ ॥

द्वितीयस्वच्छन्दभैरवरस ।
पिप्पलीं जातिकोषं च पारदं गन्धकं विषम् ।
वारिणा मर्दयेत्खल्ले रक्तिकार्द्धं प्रयोजयेत् ॥ १५ ॥
स्वच्छन्दभैरवो नाम भैरवेण विनिर्मितः ।
नवज्वरं महाघोरं नाशयेन्नात्र संशयः ॥ १६ ॥
पीपल, जायफल, पारा, गन्धक और शुद्ध वत्सनाभ विष इन ओषधियोंको जलके साथ खूब खरल करके आधी आधी रत्तीकी गोलियाँ बनाकर प्रयोग करे। इस