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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 123 of 1416

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Page 123

प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । ९१

पारा, गन्धक, शुद्ध वत्सनाभ विष, सोंठ, पीपल, मिरच, हरड, बहेडा, आमला और शुद्ध दन्तीके बीज (जमालगोटा) इन सब ओषधियोंके समान भाग लेकर चूर्ण करके द्रोणपुष्पी (गूमा) के रसमें खरल करके पुट देवे। फिर उडदकी बराबर गोलियाँ बनाकर नवीन ज्वरमें सेवन करे। यह रस नवज्वरकी परमोत्तम औषध है ॥ २१ ॥ २२ ॥

नवज्वरारि रस ।

एकभागो रसो भागद्वय च शुद्धगन्धकम् ।
गरलस्य त्रयो भागाश्चतुर्भागा हिमावती ॥ २३ ॥
जैपालकः पञ्चभागो निम्बूद्रवविमर्दितः ।
कृमिघ्नप्रमिता वट्यः कार्याः सर्वज्वरच्छिदः ॥ २४ ॥
शृङ्गवेरेण दातव्या वटिकैका दिने दिने ।
जीर्णज्वरे तथाऽजीर्णे समे वा विषमेऽपि वा ॥
निहन्त्यसौ ज्वरं घोरं दावो वनमिवानलः ॥ २५ ॥

पारा १ भाग, गन्धक २ भाग, वत्सनाभ ३ भाग, सत्यानाशी कटेरी ४ भाग और जमालगोटे ५ भाग ले सबको एकत्र पीसकर निम्बूके रसमें खरल करके वायविडंगकी बराबर गोलियाँ बनालेवे। इनमेंसे प्रतिदिन एक एक गोली अदरखके रसके साथ देनेसे सर्व प्रकारके ज्वर नष्ट होते हैं। इन गोलियोंको सम अथवा विषमज्वर, जीर्णज्वर और अजीर्ण रोगमें भी प्रयोग करना चाहिये। यह रस सब प्रकारके भयंकर ज्वरोंको इस प्रकार नष्ट करदेता है, जैसे दावाग्नि वनको तत्काल भस्म करदेती है ॥ २३–२५ ॥

सर्वाङ्गसुन्दररस ।

शुद्धसूतं च गन्धं च विषं च जयपालकम् ।
कटुत्रयं च त्रिफला टङ्कणं च समांशकम् ॥ २६ ॥
अस्य मात्रा प्रयोक्तव्या गुञ्जात्रयसमा ततः ।
सर्वेषु ज्वररोगेषु सामवाते विशेषतः ॥ २७ ॥
नाशयेच्छ्वासकासौ च ह्यग्निसादं विशेषतः ।
ब्रह्मणा निर्मितः पूर्वं रसः सर्वाङ्गसुन्दरः ॥ २८ ॥

शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, शुद्ध मीठातेलिया, शुद्ध जमालगोटे, त्रिकुटा, त्रिफला और सुहागा सबको समान भाग लेकर एकत्र बारीक पीसकर और जलके साथ