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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

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Page 1141

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ११०९

दाह, आनाह, मोह, प्रमेह, अनेक प्रकारके रुधिरविकार और पित्तजनित सम्पूर्ण रोगोंको तत्काल नष्ट करता है। इसको सितामण्डूर कहते हैं ॥ ५ ॥ ६ ॥

शुण्ठीखण्ड ।

शुण्ठीचूर्णस्य कुडवं खण्डप्रस्थं समाचरेत् ।
दत्त्वा द्विकुडवं सर्पिः क्षीरप्रस्थद्वये पचेत् ॥ १०७ ॥
लेह्येऽवतारिते दद्याद्धात्रीधान्यकमुस्तकम् ।
अजाजी पिप्पली वांशी त्रिजातं कारवी शिवा ॥१०८॥
त्रिशाणं मरिचं नागं षण्माषं तु पृथक् पृथक् ।
पलत्रयं च मधुनः शीतीभूते प्रदापयेत् ॥ १०९ ॥
ततो मात्रां प्रयुञ्जीत अम्लपित्तनिवृत्तये ।
शूलहृद्रोगवमनेरामवातैश्च पीडितः ॥ ११० ॥

सोंठका चूर्ण १६ तोले, खाँड ६४ तोले, घी ३२ तोले और दूध १२८ तोले इन सबको एकत्रकर विधिपूर्वक पकावे। जब पकते पकते लेहके समान होजाय तब चूल्हेसे उतारकर उसमें आमले, धनियाँ, नागरमोथा, जीरा, पीपल, वंशलोचन, दारचीनी, इलायची, तेजपात, कालाजीरा, और हरड ये प्रत्येक औषधि एक एक तोला एवं कालीमिरच और नागकेशर इनको छः छः मासे लेकर खूब महीन पीस-कर डालदेवे और पाकके शीतल होजानेपर १२ तोले शहद डालकर सबको अच्छे प्रकार मिलादेवे। इसकी प्रतिदिन युक्तियुक्त मात्राको सेवन करनेसे अम्लपित्त, शूल हृदयरोग, वमन और आमवातरोग जाता है ॥ १०७–११० ॥

पिप्पलीखण्ड ।

कणाचूर्णस्य कुडवं षट्पलं हविषस्तथा ।
शतावरीरसस्याष्टौ पलान्यत्र प्रदापयेत् ॥ १११ ॥
खण्डप्रस्थं समादाय क्षीरप्रस्थद्वये पचेत् ।
त्रिजातमुस्तधन्याकशुण्ठीवांशीद्विजीरकम् ॥ १२ ॥
अभयाऽऽमलकं चैव चूर्णं द्वादशमाषकम् ।
तदर्द्धं मरिचं नागं सारं खदिरमेव च ॥
पलत्रयं च मधुनः शीतीभूते प्रदापयेत् ॥ १३ ॥