भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in context| ११०८ | भैषज्यरत्नावली । | [ अम्लपित्त- |
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मृदुदहनशिखाभिर्मन्दमन्दं कटाहे
विगतसलिलशेषं पाचयेत्पाकविज्ञः ।
वितरितगुडपाके किञ्चिदुष्णेऽवतीर्णे
दृषदि दृढमभीक्ष्णं चूर्णितं देयमाशु ॥ ३ ॥
त्रिकटुकमधुकैलायासवैडङ्गसारं
त्रिफलगदलवङ्गं कर्षमेकैकशश्च ।
तदनु शिशिरकाले द्वे पले माक्षिकस्य
तदनु पटनिघृष्टं गालितं संप्रदद्यात् ॥ ४ ॥
चार तोले मण्डूरको धमनविधिसे सात बार गोमूत्रमें शुद्ध कर तीक्ष्ण, धूपमें सुखाकर चूर्ण करलेवे । फिर मिश्री २० तोले, पुराना घी ३२ तोले और गौका दूध ६४ तोले इन सबको कढाईमें डालकर मन्दमन्द अग्निसे पकावे । जब पकते पकते गुडके पाकके समान गाढा पडजाय तब नीचे उतारकर उस मन्दोष्ण पाकमें सोंठ, मिरच, पीपल, मुलहठी, इलायची, जवासा, वायविडङ्ग, त्रिफला, कूठ और लौंग इनको एक एक तोला लेकर पत्थरपर खूब बारीक पीसकर मिलादेवे । जब शीतल होजाय तब इसको ८ तोले शहदको कपडेमें छानकर उसीमें मिलाकर शुभ-तिथि और शुभदिनमें भोजन करनेसे पहले सेवन करे ॥ २-४ ॥
शुभतिथिदिवसादौ भोजनादौ निषेव्यं
प्रथमदिवसमेकं शाणमानं तदूर्ध्वम् ।
अहरहरनुवृद्धया यावदक्षं प्रयोज्यं
हिमकररुचिशीतं गव्यदुग्धं च पेयम् ॥ ५ ॥
नियतमयमसाध्यानम्लपित्तोत्थशूलान्
वमिनिवहसदाहानाहमोहप्रमेहान् ।
विविधरुधिररोगान् पित्तयुक्तानशेषा-
नपहरति सितारख्यो दिव्यमण्डूरयोगः ॥ ६ ॥
इसको प्रथम दिन ४ मासे और पश्चात् प्रतिदिन मात्राकी वृद्धि करतेहुए दो तोलेतक सेवन करे और ऊपरसे शीतल गोदुग्ध पान करे । यह दिव्य मण्डूर निरन्तर सेवन करनेपर असाध्य अम्लपित्त, तज्जन्यशूल, वमन, निवाही,