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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 1142 of 1416

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Page 1142

१२१० भैषज्यरत्नावली। [ अम्लपित्त-

पीपलका चूर्ण १६ तोले घी २४ तोले, शतावरका रस ३२ तोले, खाँड ६४ तोले और दूध १२८ तोले लेकर सबको एकत्र पकावे। जब पाक सिद्ध होजाय तब दारचीनी, इलायची, तेजपात, नागरमोथा, धनियाँ, साँठ, वंशलोचन, जीरा, कालाजीरा, हरड, आमले इनका चूर्ण एक एक तोला, मिरच, नागकेशर और खैरसार ये छः छः मासे इन सबको एकत्र कूटपीसकर डालदेवे एवं शीतल होनेपर १२ तोले शहद मिलादेवे ॥ १११-१३ ॥

ततो मात्रां प्रयुञ्जीत अम्लपित्तनिवृत्तये ॥ १४ ॥
शूलारोचकहृल्लासच्छर्द्दिपित्ताम्लशूलनुत् ।
अग्निसन्दीपनो हृद्यः खण्डपिप्पलिको मतः ॥ १५ ॥

फिर अम्लपित्तकी निवृत्तिके लिये उचितमात्रासे सेवन करे। इससे शूल, अरुचि, हल्लास, वमन, अम्लपित्त और शूलरोग नष्ट होते हैं। यह पिप्पलीखण्ड जठराग्निको दीपन करनेवाला और हृदयको हितकारी है ॥ ११४ ॥ १५ ॥

बृहत्पिप्पलीखण्ड ।

पिप्पल्याः कुडवं चूर्णं घृतस्य कुडवद्वयम् ।
पलषोडशिकं खण्डाद्रसे वर्य्याः पलाष्टके ॥ १६ ॥
पलषोडशिके चैव आमलक्या रसस्य च ।
क्षीरप्रस्थद्वये साध्यं लेहीभूते ततः क्षिपेत् ॥ १७ ॥
त्रिजातकाभयाजाजी धन्याकं मुस्तकं शुभा ।
धात्री च कार्षिकं चूर्णं कर्षाद्धं चापि जीरकम् ॥ १८ ॥
कुष्ठं नागरकं नागं सिद्धशीतेऽवचूर्णितम् ।
जातीफलं समरिचं मधुनश्च पलद्वयम् ॥ १९ ॥

पीपलका चूर्ण १६ तोले, घी ३२ तोले, चीनी ६४ तोले, शतावरका रस ३२ तोले और आमलोंका रस ६४ तोले इनको दो प्रस्थ गोदुग्धमें उत्तमप्रकार पकावे। जब पाक पकते पकते लेहके समान होजाय तब उसमें त्रिजातक, हरड, कालाजीरा, धनियाँ, नागरमोथा, वंशलोचन, और आमले इनका चूर्ण एक एक तोला एवं जीरा, कूठ, साँठ, नागकेशर, जायफल और मिरच इनको छः छः मासे लेकर, सबोंको एकत्र बारीक पीसकर डालदेवे और शीतल होनेपर ८ तोले मध डालकर सबको एकमएक करलेवे ॥ १६-१९ ॥