भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in context[चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ११०७
एला जातीफलं मांसी पत्रं तालीशकेशरम् ।
गन्धमात्रा शठी यष्टिलवङ्गं रक्तचन्दनम् ॥ ९६ ॥
एतानि समभागानि शुण्ठीचूर्णं तु तत्समम् ।
सिता द्विगुणिता तत्र गव्यक्षीरं चतुर्गुणम् ॥ ९७ ॥
तोलप्रमाणं दातव्यं दुग्धेनापि जलेन वा ।
अम्लपित्तं निहन्त्येतदरोचकनिषूदनम् ॥ ९८ ॥
शूलहृद्रोगशमनं कण्ठदाहं नियच्छति ।
हृद्दाहं च शिरःशूलं मन्दाग्नित्वं विनाशयेत ॥ ९९ ॥
हृच्छूलं पार्श्वकुक्षिस्यवस्तिशूलं गुदे रुजम् ।
बलपुष्टिकरं चैव वशीकरणमुत्तमम् ॥ १०० ॥
विशेषादम्लपित्तं च मूत्रकृच्छ्रं ज्वरं भ्रमम् ।
निहन्ति नात्र सन्देहो भास्करस्तिमिरं यथा ॥ १ ॥
सोंठ, मिरच, पीपल, हरड, बहेडा, आमला, दारचीनी, जीरा, कालाजीरा, धनियाँ, कूठ, अजमोद, लोहा, अभ्रक, काकडासिंगी, कायफल, नागरमोथा, इलायची, जायफल, बालछड, तेजपात, तालीसपत्र, नागकेशर, गन्धमात्रा, (एक प्रकारका सुगन्धिद्रव्य), कचूर, मुलहठी, लौंग और लालचन्दन, इन औषधियोंके चूर्णको समान भाग और सब चूर्णके बराबर भाग सोंठका चूर्ण लेवे, फिर समस्त चूर्णसे दुगुनी मिश्री और गौका दूध सबसे चौगुना भाग लेकर सबोंको एकत्र मिलाकर विधिपूर्वक पाक करे। जब पाक पूर्ण होजाय तब एक एक तोलेके लड्डू बनालेवे। पश्चात् एक मोदक प्रतिदिन दूधके अथवा जलके साथ खानेसे अम्लपित्त, अरुचि, शूल, हृदयरोग, कण्ठदाह, हृदयकी दाह, शिरदर्द, मन्दाग्नि, हृदय, पसली, कुक्षि और वस्तिगत शूल, गुदाके रोग, मूत्रकृच्छ्र, ज्वर, भ्रमादि रोग विशेषकर अम्लपित्तरोग निश्चय नष्ट होते हैं। यह मोदक बल, पुष्टिकारक और उत्तम वशीकरण औषधि है ॥ ९६-१०१ ॥
सितामण्डूर ।
धमनविधिविशुद्धं गोजले सप्तवारान्
तरणिकिरणशुष्कं श्लक्ष्णमण्डूरचूर्णम् ।
विमलकवलमेकं पञ्चसंख्यं सिताया ।
अभवघृतपलाष्टौ व्यष्टकं गव्यदुग्धम् ॥ २ ॥