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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 1138 of 1416

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Page 1138

११०६ | भैषज्यरत्नावली । | [ अम्लपित्त-

कर्पूरं च विडङ्गं च अजमोदा बलाऽमृता ।
मर्कटी क्षुरबीजं च चन्दनं देवताडकम् ॥ ९० ॥
लौहं कांस्यं प्रदातव्यं कर्षमात्रं भिषग्विदा ।
अन्यत्सर्वं कर्षमात्रं कर्षाद्धं स्वर्णभस्मकम् ॥ ९१ ॥
चतुर्द्धातुविधानेन मारितं ग्राहयेत्सुधीः ।
अम्लपित्तान्तको ह्येष मोदको मुनिभाषितः ॥ ९२ ॥

सोंठ, पीपल और सुपारी इनका चूर्ण बत्तीस बत्तीस तोले, घी और दूध एक एक प्रस्थ इन सबोंको एकत्र मिलाकर पकावे। जब पकते पकते अवलेहकी समान गाढा होजाय तब उसमें लौंग, केशर, कूठ, अजवायन, कालाजीरा, वच, लाल-चन्दन, मुलहठी, रायसन, देवदारु, त्रिफला, पत्रज, इलायची, दारचीनी, सैंधानमक, धनियाँ, कचूर, मैनफल, कायफल, बालछड, अभ्रकभस्म, वंगभस्म, रौप्यभस्म, तालीशपत्र, पद्माख, मूर्वा, वराहक्रान्ता, वंशलोचन, पीपलामूल, सौंफ, शतावर, पीलीकटसरैया, जायफल, जावित्री, शीतलचीनी, नागरमोथा, पीपल, कपूर, वायविडंग, अजमोद, खिरेंटी, गिलोय, कौंछके बीज, तालमखाना, सफेदचन्दन, देवताड, लोहेकी भस्म और कांसका भस्म ये प्रत्येक औषधि एक एक तोला और चतुर्द्धातुविधिसे जारित सुवर्णभस्म छः माशे इन सबको एकत्र खूब बारीक पीसकर मिलादेवे, फिर करछीसे एकमएक करके मोदक बनालेवे । प्रतिदिन प्रातःकाल उचित मात्रासे सेवन करे ॥ ८५-९२ ॥

वान्तिं मूर्च्छां च दाहं च कासं श्वासं भ्रमं तथा ।
वातजं पित्तजं चैव कफजं सान्निपातिकम् ॥ ९३ ॥
सर्वरोगं निहन्त्याशु प्रमेहं सूतिकागदम् ।
शूलं च वह्निमान्द्यं च मूत्रकृच्छ्रं गलग्रहम् ॥ ९४ ॥

यह अम्लपित्तान्तक मोदक वमन, मूर्च्छा, दाह, श्वास, खाँसी, भ्रम, वातज, पित्तज, कफज और सन्निपातज सर्वरोग, प्रमेह, सूतिकारोग, शूल, मन्दाग्नि, मूत्रकृच्छ्र, गलग्रह इत्यादि विकारोंको शीघ्र नष्ट करता है ॥ ९३ ॥ ९४ ॥

सौभाग्यशुण्ठीमोदक ।

त्रिकटु त्रिफला भृङ्गजीरकद्वयधान्यकम् ।
कुष्ठामजोदा लौहाभ्रं शृङ्गी कट्फलमुस्तकम् ॥ ९५ ॥