About this granth
Betal Pachisi (बेताल पच्चीसी), 'twenty-five tales of the vetala', is one of India's most popular story cycles. It goes back to the Sanskrit Vetalapanchavimshati, a version of which appears in the Kathasaritsagara of the eleventh-century Kashmiri poet Somadeva. In the frame story King Vikramaditya, at a mendicant's request, sets out to carry a corpse inhabited by a vetala down from a tree in the cremation ground. On the way the vetala tells him a story ending in a riddle; when the king answers correctly, the vetala flies back to the tree, and so the cycle of twenty-five tales unfolds.
This book tells the stories in order, from Padmavati and the three young Brahmins to the parrot and the myna, Viravara, Somaprabha, Princess Anangarati, Madanasena, Jimutavahana, Unmadini, Chandrasvami, Anangamanjari and Manivarma, the four Brahmin brothers and the ascetic.
The title page credits the original to Somadeva Bhatta. The Hindi retelling is by Ved Prakash Soni with illustrations by Shankar Nayak, published by Jan Sahitya Parishad, Delhi, in 2002, and runs to 151 pages.
ही हो जाएगा। अतः उसने विनयपूर्वक गरुड़ के सामने एक योजना रखी—'हे पक्षीराज, इस दक्षिण समुद्र के किनारे तुम्हारे भोजन के लिए मैं प्रतिदिन एक सर्प भेज दिया करूंगा किंतु तुम किसी प्रकार, किसी भी समय पाताल में नहीं आओगे; क्योंकि एक साथ ही सब सर्पों के नष्ट हो जाने से तुम्हें भी कुछ लाभ नहीं होगा।'
गरुड़ ने भी इसमें अपना लाभ देखा और वासुकि की बात स्वीकार कर ली। पक्षीराज गरुड़ इस तट पर वासुकि द्वारा भेजे हुए एक सर्प को प्रतिदिन खाया करता है। यह उसी के द्वारा खाये गए सर्पों की हड्डियां हैं, जो समय पाकर बढ़ते-बढ़ते अब पर्वत शिखर के समान हो गई हैं।
दया और धैर्य के सागर जीमूतवाहन ने मित्रावसु के मुख से जब यह वृत्तांत सुना तो उसके मन को भारी कष्ट पहुंचा। उसने कहा—"शोक करने के योग्य तो सर्पों का राजा वासुकि है जो ऐसा कायर है कि प्रतिदिन अपनी प्रजा को शत्रु को भेंट कर देता है। हजार मुखवाला यह वासुकि अपने एक मुख से भी यह क्यों नहीं कह सका कि 'गरुड़, पहले तुम मुझे ही खा लो।' प्रतिदिन नगरपलियों का विलाप सुनकर भी उस निर्दयी वासुकि ने अपने कुल का नाश करने वाले गरुड़ से प्रार्थना क्यों की ? अरे, मोह भी कैसा गाढ़ा होता है ! यद्यपि गरुड़ महर्षि कश्यप का पुत्र है, वीर है और भगवान विष्णु का वाहन होने के कारण पवित्र है, फिर भी ऐसा पाप करता है।'
ऐसा कहकर परम पराक्रमी जीमूतवाहन ने मन-ही-मन निश्चय किया कि 'इस नाशवान शरीर से मैं अमरता प्राप्त करूंगा। मैं आज ही अपना शरीर देकर गरुड़ के पंजे से कम-से-कम एक ऐसे सर्प की रक्षा करूंगा जो हितैषियों से रहित तथा डरा हुआ है।'
जीमूतवाहन ऐसा सोच ही रहा था तभी मित्रावसु के पिता के पास से एक प्रतिहारी उन्हें बुलाने के लिए वहां पहुंच गया। जीमूतवाहन ने यह कहकर उसे घर भेज दिया कि 'तुम चलो, मैं कुछ देर बाद आऊंगा।'
मित्रावसु के जाने के बाद जीमूतवाहन वैसे ही इधर-उधर विचरण करने लगा। तभी उसके कानों में किसी के रुदन का स्वर सुनाई पड़ा। वह पास पहुंचा और छिपकर एक शिलाखंड के नीचे खड़ा हो गया। वहां उसने एक वृद्धा नागस्त्री को विलाप करते देखा। उसके समीप ही एक सुंदर-सा काले रंग वाला नागयुवक खड़ा था, जो उस स्त्री से अनुनयपूर्वक उसे घर लौट जाने को कह रहा था।
'यह कौन है ?' इसे जानने को उत्सुक जीमूतवाहन ने छिपकर उनकी बातें सुनीं। वृद्धा स्त्री उस युवक से रोते हुए कह रही थी—' 'हा शंखचूड़, हा सौ-सौ दुखों से पाए हुए मेरे गुणी पुत्र ! हा मेरे कुल के एकमात्र सूत्र, अब मैं फिर तुम्हें कहां देख सकूंगी। हा मेरे कुलदीपक ! तुम्हारे बिना तुम्हारे वृद्ध पिता कैसे अपना बुढ़ापा काट सकेंगे ? तुम्हारे जो अंग सूर्यकिरणों के स्पर्श से भी कुम्हला जाते थे, वे गरुड़ के द्वारा खाये जाने की पीड़ा कैसे सहन कर पाएंगे ? नागलोक तो बहुत बड़ा है, फिर विधाता
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और नागराज ने मुझ अभागिनी के एकमात्र पुत्र, तुम्ही को क्यो चुन लिया ?''
इस प्रकार रोती-बिलखती हुई उस मां से उसके युवा पुत्र ने कहा—‘‘मां, मैं तो स्वय ही बहुत दुखी हूं। तुम मुझे और दुखी क्यों कर रही हो ? अब तुम घर लौट जाओ। मैं तुम्हें अंतिम प्रणाम करता हूं। गरुड़ के आने का समय हो रहा है। '' यह सुनकर वृद्धा पछाड़ खाकर गिर पड़ी और किसी की सहायता मिलने की आशा में इधर-उधर व्याकुल नेत्रों से देखने लगी।
यह सब देखकर और सुनकर बोधिसत्व के अंश-रूप जीमूतवाहन को बड़ी दया आई। वह सोचने लगा 'आह ! तो यही है शंखचूड़ नामक वह नाग, जिसे वासुकि ने गरुड़ के भोजन के लिए भेजा है और यह इसकी वृद्धा माता है जो अपने एकमात्र पुत्र के स्नेह के कारण ममतावश रोती हुई यहां तक आई है। आज यदि मैंने इसके जीवन की रक्षा न की तो मेरे जीवन को धिक्कार है।'
यह सोचकर वह उस वृद्धा और युवक के पास पहुंचा और बोला—‘‘मां तुम चिंता मत करो, मैं तुम्हारे पुत्र की रक्षा करूंगा।'' वृद्धा उसे देखकर भयभीत हो गई। उसने समझा कि वही गरुड है। ऐसा विचारकर उसने कातर स्वर मे जीमूतवाहन से कहा—‘‘गरुड़, मेहरबानी करके तुम मुझे खा लो किंतु मेरे पुत्र का जीवन बख्श दो।''
तब शंखचूड़ ने अपनी माता को धीरज दिया—‘‘मां, तुम डरो मत, यह गरुड़ नही है। कहां चंद्रमा के समान आनद देने वाले ये महापुरुष और कहां वह नागभक्षी गरुड़ ! शंखचूड़ के ऐसा कहने पर जीमूतवाहन ने कहा—‘‘मां, तुम घबराओ नहीं, मैं एक विद्याधर हूं। तुम्हारे पुत्र की रक्षा के लिए यहां आया हूं। उस मूर्ख गरुड़ को मै अपना शरीर अर्पित करूंगा। तुम अपने पुत्र के साथ घर लौट जाओ।''
यह सुनकर वृद्धा ने कहा—‘‘ऐसा मत कहो, तुम भी मेरे पुत्र के समान हो। तुमने मेरे पुत्र की जगह अपना बलिदान देने की बात कहकर मुझ पर बहुत कृपा की है।''
तब जीमूतवाहन ने कहा—‘‘मां, जब तुमने मुझे पुत्र कहकर यह सम्मान दिया है तो मेरे मनोरथ को सिद्ध होने दो, मुझे इस बलिदान से मत रोको, मां ! अन्यथा मैं यह समझूंगा कि मेरा जीवन व्यर्थ ही गया। ''
जीमूतवाहन ने जब ऐसा कहा, तब शंखचूड़ उससे बोला—‘‘हे महासत्त्व, तुमने सचमुच बहुत दयालुता दिखलाई है किंतु मैं अपने लिए तुम्हारे जीवन का बलिदान स्वीकार नहीं कर सकता। मेरे जैसे साधारण व्यक्तियों से तो यह संसार भरा पड़ा है किंतु आप जैसे विरले ही इस संसार में मिलते हैं। हे सुबुद्धि ! चन्द्रबिंब के कलंक के समान मैं अपने पिता शंखपाल के पवित्र कुल को मलिन न कर सकूंगा।''
ऐसा कहकर शंखचूड़ ने अपनी माता से कहा—‘‘मां, तुम इस दुर्गम वन से लौट जाओ। क्या तुम इस वध्य-शिला को नहीं देखती जो सर्पों के रक्त से भीगी हुई है
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और यमराज की विलास शय्या के समान भयानक है। मैं गरुड़ के आने से पहले ही
समुद्र तट पर जाकर भगवान गोकर्ण को प्रणाम करके शीघ्र ही लौटकर आता हूं।"
यह कहकर शंखचूड़ ने करुण स्वर में रोती हुई अपनी माता से विदा लेकर उसे प्रणाम
करके गोकर्ण की वन्दना के लिए वहां से प्रस्थान किया।
जीमूतवाहन यह सोचकर कि 'यदि इसी बीच गरुड़ आ जाए, तो मेरा मनोरथ
पूरा हो जाए, वह उस शिला पर जाकर लेट गया जो गरुड़ के शिकार के लिए
निश्चित की गई थी।
कुछ ही क्षण बाद गरुंड़ वहां पहुंच गया। उसने जीमूतवाहन को अपने विकराल
पंजों में दबाया और ऊपर उड़ गया। जीमूतवाहन को पंजों में दबाए हुए जब गरुड़
उसे चोंच मार-मारकर खाने लगा तो उसके शरीर से रक्त झर-झरकर नीचे टपकने
लगा। इस बीच जीमूतवाहन का शिरोमणि, जिस पर रक्त लगा हुआ था, नीचे ठीक
उस स्थान पर जाकर गिरी जहां उसका पिता, माता एवं उसकी पत्नी मलयवती बैठे
हुए थे।
मलयवती ने अपने पति की शिरोमणि को तुरंत पहचान लिया और वह विह्वल
हो उठी। आंखों में आंसू भरकर उसने अपने सास-ससुर को जब वह शिरोमणि
दिखाई तो वे भी घबरा उठे।
तत्पश्चात्, अपनी विद्या के द्वारा ध्यान करके राजा जीमूतकेतु ने सारा वृत्तांत
जान लिया और वह अपनी रानी कनकवती तथा पुत्रवधु के साथ शीघ्र ही उस स्थान
की ओर चल पड़े जहां गरुड़ जीमूतवाहन को ले गया ता।
इधर शंखचूड़ जब गोकर्ण को प्रणाम करके लौटा तो उसने विकल होकर देखा
कि वध्य शिला रक्त से भीगी हुई थी। शंखचूड़ समझ गया कि परोपकारी
जीमूतवाहन ने उसकी जगह स्वयं का बलिदान कर दिया था। तब उसने मन में सोचा
कि 'मैं इस बात का पता अवश्य लगाऊंगा कि सर्पों का शत्रु वह गरुड़ उस महान
आत्मा को कहां ले गया है ? यदि मैं उसे जीवित पा सका तो अपयश के कलंक को
अपने माथे से धो सकूंगा।'
तब शंखचूड़ खून की टपकी बूंदों के सहारे आगे बढ़ता गया। उधर गरुड़ जब
जीमूतवाहन को खा रहा था तो एकाएक उसे यह जानकर कुछ संदेह-सा हो गया कि
उसका शिकार बजाय चीखने-चिल्लाने के शांत भाव से प्रसन्नचित उसी की ओर देख
रहा था। इस पर उसने उसे खाना बंद करके सोचा—'अरे, यह तो कोई अपूर्व
व्यक्ति है जो ऐसा पराक्रमी है कि मेरे खाये जाने पर भी प्रसन्न हो रहा है और इसके
प्राण भी नहीं निकलते। इसके शरीर का जो थोड़ा-बहुत भाग शेष रह गया है, उसमें
भी स्पंदन नहीं है। यह तो मुझे इस तरह देख रहा है जैसे इसे खाकर मैं इस पर कोई
उपकार कर रहा हूं। अवश्य ही यह सर्प नहीं है, निश्चित ही यह कोई सज्जन व्यक्ति
है। अब मैं इसे नहीं खाऊंगा।'
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गरुड़ ऐसा सोच ही रहा था कि जीमूतवाहन बोला—'‘रुक क्यों गए पक्षिराज।
मुझे खाओ और अपनी क्षुधा शांत करो। अभी तो मेरे शरीर का काफी हिस्सा शेष
है। ' '
यह सुनकर गरुड़ को बहुत आश्चर्य हुआ। वह बोला—'‘हे महात्मन, कौन हैं
आप ? सर्प तो आप हो ही नहीं सकते, फिर आप कौन हैं ? कृपा करके मुझे अपना
परिचय दें।' '
जीमूतवाहन ने उत्तर में कहा—'‘यह तुम्हारा कैसा प्रश्न है गरुड़ ? मैं तुम्हारा
भक्ष्य हूं और कुछ भी नहीं। अतः निर्मम होकर मेरा भक्षण करो।
जीमूतवाहन जब गरुड़ से यह बातें कर रहा था, उसी समय शंखचूड़ उन्हें
खोजता हुआ वहां आ पहुंचा। उसने दूर से ही गुहार लगाई—'‘रुको विनता पुत्र।
इसे खाकर कलंक के भागी मत बनो। यह तुम्हारा भक्ष्य नहीं है, तुम्हारा भक्ष्य तो मैं
हूं, एक नागपुत्र।' '
यह कहता हुआ वह दौड़कर वहां पहुंचा और उन दोनों के बीच खड़ा हो गया।
गरुड़ को चक्कर में पड़ा देखकर शंखचूड़ ने पुनः कहा—'‘किसी भ्रम में मत पड़ो
विनता पुत्र। तुम जिसे अपना भक्ष्य समझकर उठा लाए हो, वह तो एक महान
आत्मा, महान परोपकारी, विद्याधरों का राजा जीमूतवाहन है। तुम्हारा असली
शिकार तो मैं हूं। यह देखो मेरी दो जुबानें और मेरा फन...।' ' ऐसा कहकर शंखचूड़
ने अपनी दोनों जुबानें और अपना फन उसे दिखाया।
जब शंखचूड़ गरुड़ को अपना फन दिखा रहा था, ठीक उसी समय जीमूतवाहन
की पत्नी और उसके माता-पिता भी वहां आ पहुंचे और जीमूतवाहन के क्षत-विक्षत
शरीर को देखकर हाहाकार करने लगे।
यह सब जानकर गरुड़ को भारी पश्चाताप हुआ। वह अपने मन में सोचने लगा कि
'हाय ! मैने भ्रम में पड़कर बोधिसत्व के इस अंश को कैसे खा लिया ? यह तो दूसरों को
प्राण देने वाला वही जीमूतवाहन है जिसका यश तीनों लोकों में फैला हुआ है। अतः अब
यदि इसकी मृत्यु हो गई तो मुझ पापी को अग्नि में प्रवेश करना पड़ेगा, क्योंकि अधर्म रूपी
विष-वृष का फल पककर भला मीठा कैसे हो सकता है?''
गरुड़ जब इस प्रकार पश्चाताप कर रहा था, तभी जीमूतवाहन ने अपने
माता-पिता एवं पत्नी की ओर देखा। एकाएक उसका शरीर जोर से कांपा और
उसके प्राण पखेरू उड़ गए।
अपने पुत्र को मृत समझकर जीमूतवाहन के माता-पिता आर्तनाद करने लगे।
शंखचूड़ भी स्वयं को बार-बार कोसने लगा कि उसी के कारण इस महात्मा की जान
गई। उसकी पत्नी मलयवती आंखों में आंसू भरकर आकाश की ओर देखती हुई उस
अम्बिका को उलाहना देने लगी जिसने प्रसन्न होकर उसे वरदान दिया था। वह
बोली—'‘हे देवी, उस समय तो आपने मुझे यही वरदान दिया था कि तुम्हारा पति
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विद्याधरों का चक्रवती राजा होगा। फिर अब आपका वह वरदान असत्य कैसे हो
गया, मां!''
मलयवती जब बार-बार ऐसा कहकर रुदन कर रही थी, तभी वहां प्रकाश-सा फैला
और साक्षात् देवी अम्बिका वहां प्रकट हो गई। मां अम्बिका ने कहा—''बेटी, मेरी बात
झूठी नहीं है। लो मैं तुम्हारे पति को पुनः जीवित किए देती हूं।'' ऐसा कहकर मां
अम्बिका ने अपने कमंडल के अमृत से जीमूतवाहन के अस्थिपंजर को सींच दिया।
जीमूतवाहन जीवित हो उठा, उसके कटे-फटे अंग पुनः जुड़ गए और वह पहले
से भी अधिक सुंदर व कांतिमान बन गया। जीमूतवाहन ने तब देवी मां को प्रणाम
किया। औरों ने भी उसका अनुसरण किया। तब देवी मां ने उससे कहा—''पुत्र
जीमूतवाहन, मैं तुम्हारे देहदान से परम संतुष्ट हूं इसलिए अपने हाथों से मैं तुम्हारा
चक्रवर्ती पद पर अभिषेक करती हूं। तुम एक कल्प तक विद्याधरों पर राज्य
करोगे।''
यह कहकर देवी ने कलश के जल से जीमूतवाहन का अभिषेक किया। फिर वह
अन्तर्ध्यान हो गई।
उसी समय वहां फूलों की वर्षा हुई और आकाश में उपस्थित देवताओं की
दुन्दभियां बजने लगीं।
अब गरुड़ ने विनीत होकर जीमूतवाहन से कहा—''हे चक्रवर्ती, मैं आपके
अपूर्व पराक्रम से बहुत प्रसन्न हूं। तुमने जो कुछ किया है, वह तीनों लोकों को
अचरज में डालने वाला है। इस कृत्य से तुमने अपना नाम ब्रह्मांड की भित्ति पर लिख
दिया है। अतः आप मुझे आज्ञा दीजिए और मेरे द्वारा कोई वर प्राप्त कीजिए।''
इस पर जीमूतवाहन ने कहा—''हे पक्षिराज ! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो
आप वचन दीजिए कि आज से फिर आप सर्पों का भक्षण न करेंगे। साथ ही ये भी
कि जिन सर्पों को आप खा चुके हैं और जिनकी हड्डियां ही शेष रही हैं, उन्हें भी पुनः
जीवनदान देंगे।'' तब गरुड़ ने ऐसा ही वचन दिया। साथ ही मृत सर्पों को भी फिर
से जीवित कर दिया।
गौरी की कृपा से सभी विद्याधरों ने जीमूतवाहन के इस अद्भुत कृत्य की बात
जान ली। कुछ ही देर में वे सभी राजा वहां आ पहुंचे। उन्होंने जीमूतवाहन के चरणों
में झुककर प्रणाम किया। जीमूतवाहन ने जब गरुड़ को विदा कर दिया, तब वे
उसके संबंधियों और मित्रों सहित उसे हिमालय पर्वत पर ले गए, जहां पार्वती ने
अपने हाथों अभिषेक करके उसे चक्रवर्ती का पद दिया।
जीमूतवाहन ने अपने माता-पिता, मित्रावसु, मलयवती तथा घर जाकर लौटे हुए
शंखचूड़ के साथ रहते हुए, बहुत दिनों तक चक्रवर्ती सम्राट का पद संभाला। उसका
साम्राज्य उन रत्नों से भरपूर था, जिन्हें उसने अपने अलौकिक कार्यों द्वारा अद्भुत
रूप से प्राप्त किया था।
बेताल पच्चीसी ▢ 105
बेताल ने यह अत्यंत अद्भुत कथा सुनाकर राजा विक्रमादित्य से पूछा—‘‘राजन, अब तुम यह बताओ कि उन दोनों में अधिक पराक्रमी शंखचूड़ था या जीमूतवाहन ? यदि तुम जानते हुए भी इस बात का उत्तर न दोगे तो तुम्हारा सिर खंड-खंड हो जाएगा।’’
बेताल की यह बात सुनकर शाप के भय से राजा विक्रमादित्य ने मौन त्याग दिया और उद्वेग-रहित होकर कहा—‘‘बेताल, जीमूतवाहन ने जो कुछ किया, उसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है क्योंकि उसे अनेक जन्मों की सिद्धियां प्राप्त थीं। सराहने योग्य तो शंखचूड़ ही है। उसके शत्रु को किसी और ने अपना शरीर अर्पित कर दिया था और गरुड़ उसे लेकर दूर चला गया था। फिर भी वह भागा-भागा उनके पीछे वहां गया और उसने हठपूर्वक अपना शरीर प्रस्तुत किया।’’
राजा का यह सटीक उत्तर सुनकर बेताल उसके कंधे से उतरकर फिर उसी शिंशपा-वृक्ष की ओर उड़ गया। राजा भी उसे पुनः लाने के लिए उसके पीछे-पीछे दौड़ गया।
106 □ बेताल पच्चीसी
सत्रहवां बेताल: उन्मादिनी की कथा
सत्रहवां बेताल
उन्मादिनी की कथा
राजा विक्रमादित्य ने एक बार फिर शिंशपा-वृक्ष से बेताल को उतारा। उसे कंधे पर डाला और मौन भाव से अपने गंतव्य की ओर चल पड़ा। कुछ आगे पहुंचने पर बेताल ने फिर मौन भंग किया और राजा को पुनः अपनी शर्त दोहराकर उसे यह कथा सुनाई।
बहुत पहले गंगा किनारे कनकपुर नाम का एक नगर था। वहां के राजा का नाम था—यशोधन। वह सचमुच अपने नाम को सार्थक करने वाला राजा था। वह परम प्रतापी था और प्रजा उसके राज्य में हर प्रकार से सुखी थी।
उस राजा के नगर में एक श्रेष्ठि (सेठ) रहता था, जिसकी कन्या उन्मादिनी एक परम सुन्दरी थी। जो भी उसकी ओर देखता, वह उसकी मोहिनी-शक्ति से उन्मत्त हो जाता था। उसका सौन्दर्य कामदेव को भी विचलित करने वाला था। जब सेठ की कन्या युवती हुई, उसके पिता ने राजा यशोधन के पास जाकर निवेदन किया—‘‘प्रभो ! मैं अपनी रत्न स्वरूप कन्या का विवाह करना चाहता हूं किंतु आपसे निवेदन किए बिना उसका विवाह करने का मुझे साहस नहीं होता। सभी रत्नों के स्वामी आप ही हैं अतः या तो मेरी कन्या को पत्नी रूप में स्वीकार करके आप मुझे कृतार्थ करें या अस्वीकार कर दें। ’’
वणिक की यह बात सुनकर राजा ने उस कन्या के शुभ लक्षणों को देखने के लिए आदरपूर्वक अपने ब्राह्मणों को भेजा। उन ब्राह्मणों ने वहां जाकर ज्योंही उस परम सुंदरी को देखा त्योंही उनका चित चंचल हो गया; किंतु शीघ्र ही धैर्य धारण करके उन लोगों ने सोचा—‘यदि राजा इस कन्या से विवाह करेगा तो उसका राज्य अवश्य ही नष्ट हो जाएगा क्योंकि राजा तब इसी के रूप में रमा रहेगा। वह प्रजा के हितों की देखभाल नहीं कर पाएगा। अतः हम लोगों को राजा को यह नहीं बताना चाहिए कि यह कन्या सुलक्षण है।’ यही सोचकर वे सब राजा के पास पहुंचे और उन्होंने राजा से कहा—‘‘देव, वह कन्या तो कुलटा है। हमारा परामर्श है कि आप उसके साथ विवाह न करें।’’
यह जानकर राजा ने उस सुन्दरी से विवाह करना अस्वीकार कर दिया। तब उस वणिक ने राजा की आज्ञा से अपनी कन्या का विवाह बलधर नाम के राजा के सेनापति से कर दिया। उन्मादिनी नाम से विख्यात वह सुन्दरी सुखपूर्वक अपने पति के पास रहने लगी किंतु उसके मन में एक फांस-सी बनी रही कि राजा ने कुलटा कहकर मेरा त्याग किया है।
एक बार बसन्त ऋतु में राजा यशोधन हाथी पर चढ़कर बसन्त महोत्सव देखने को निकला। राजा के आगमन की घोषणा सुनकर उन्मादिनी ने जो अपने को
बेताल पच्चीसी ❑ 107
परित्यक्त किए जाने के कारण राजा से विद्वेष रखती थी, उसे देखने के लिए अपने
भवन की छत पर जाकर उसे देखने लगी। छत पर खड़ी उस सुन्दरी की ओर जैसे ही
राजा की नजरें उठीं, उसके मन मे कामाग्नि की ज्वाला सुलग उठी। कामदेव के
विजयास्त्र के समान उसकी सुन्दरता को देखते ही वह राजा के हृदय में गहराई से
उतर गई। पलक झपकते ही राजा संज्ञाहीन हो गया। तब राजा के सेवक उसे
सम्भालकर उसके महल मे ले गए। राजा द्वारा उस सुन्दरी के बारे में पूछे जाने पर
उसके सेवकों ने उसे बता दिया कि यह वही कन्या है जिसके विवाह का प्रस्ताव पहले
राजा के साथ करने का हुआ था। लेकिन राजा के अस्वीकार करने पर उसका
विवाह उसके सेनापति के साथ कर दिया था।
यह सुनकर राजा को उन ब्राह्मणों पर बहुत क्रोध आया कि जिन्होंने उस कन्या के
बारे में गलत कहकर राजा को मिथ्या सूचना दी थी। राजा ने तत्काल उन सभी ब्राह्मणों
को देश निकाला दे दिया। तब से वह राजा मन-ही-मन दुखी रहने लगा। लज्जा के
कारण यद्यपि उसने अपनी भावना को छिपा रखा था किंतु बाहरी लक्षणों को देखकर
उसके विश्वासी जनों द्वारा पूछे जाने पर बड़ी कठिनाई से उसने अपनी पीड़ा का कारण
बताया। तब उसके विश्वासी जनों ने कहा—‘‘महाराज ! इसमें इतना दुखी होने की
क्या बात है ? वह तो आपके ही अधीन है, फिर आप उसे अपना क्यों नहीं लेते ?’’
लेकिन धर्मात्मा राजा यशोधन ने उनकी यह बात स्वीकार नहीं की।
सेनापति बलधर राजा का भक्त था। जब उसे यह बात मालूम हुई तो वह राजा
के पास पहुंचा और उसके चरणों में झुककर बोला—‘‘देव, आपके दास की वह स्त्री
आपकी दासी ही है। वह परस्त्री नहीं है। मैं स्वयं ही उसे आपको भेंट करता हूं।
आप उसे स्वीकार कर लें अथवा मैं उसे देव-मंदिर में छोड़ देता हूं। जब वह देवकुल
की स्त्री हो जाएगी, तब वहां से उसे ग्रहण करने में आपको दोष नहीं लगेगा। ’’
अपने ही सेनापति ने जब राजा से ऐसी प्रार्थना की तो आंतरिक क्रोध से उसने
उसे उत्तर दिया— ‘‘राजा होकर मैं ऐसा अधर्म कैसे करूंगा ? यदि मैं ही मर्यादा का
उल्लंघन करूंगा तो कौन अपने कर्त्तव्य मार्ग पर स्थिर रहेगा ? मेरे भक्त होकर भी
तुम मुझे ऐसे पाप में क्यों प्रवृत्त करते हो जिसमें क्षणिक सुख तो है, पर जो परलोक
में महादुख का कारण है। यदि तुम अपनी धर्मपत्नी का त्याग करोगे, तो मैं तुम्हें क्षमा
नहीं करूंगा क्योंकि मेरे जैसा कौन राजा ऐसा अधर्म स्वीकार कर सकता है ? अब
तो मृत्यु ही मेरे लिए श्रेयस्कर है। ’’
अनन्तर, नगर और गांव के लोगों ने मिलकर राजा से यही प्रार्थना की किंतु
दृढ़-निश्चयी राजा ने उनकी बात नहीं मानी। राजा का शरीर धीरे-धीरे उसी
काम-ज्वर के ताप से क्षीण होता चला गया और अंत में उसकी मृत्यु हो गई। अपने
स्वामी की मृत्यु से खिन्न होकर उसके सेनापति बलधर ने भी अग्नि में प्रवेश करके
अपने प्राण त्याग दिए। सच है, भक्तों की चेष्टाओं को नहीं जाना जा सकता।
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राजा विक्रमादित्य के कंधे पर लदे बेताल ने यह कथा सुनाकर पूछा—‘‘राजन ! अब तुम यह बतलाओ कि उस राजा और सेनापति में से, सेनापति बलधर क्यों अधिक दृढ़चरित्र नहीं था ? उसकी स्त्री तो अलौकिक सुन्दरी थी। उसने बहुत समय तक उसके साथ सुख भोगकर उसका स्वाद जाना था, फिर भी वह वैसी स्त्री को राजा को सौंपने को तत्पर हो गया ता और फिर, राजा की मृत्यु के बाद उसने स्वयं भी अपना शरीर अग्नि में होम करके अपने प्राण त्याग दिए थे। लेकिन, राजा ने उसकी उस पत्नी का त्याग किया था, जिसके भोग-रस का उसने आस्वादन भी नहीं किया था। भला ऐसा क्यों हुआ था ? इस प्रश्न का उत्तर जानते हुए भी यदि तुम मौन रहोगे तो तुम्हें मेरा वही शाप लगेगा।’’
राजा हंसकर बोला—‘‘बेताल ! कहते तो तुम ठीक ही हो लेकिन इसमें अचरज की क्या बात है ? सेनापति कुलीन वंश का था, उसने स्वामी की भक्ति में जो किया, ठीक ही किया क्योंकि सेवक का तो कर्त्तव्य ही है कि वह प्राण देकर भी अपने स्वामी की रक्षा करे लेकिन राजा तो मदमत्त हाथी की तरह निरंकुश होते हैं। वे जब विषय-लोलुप होते हैं तब धर्म और मर्यादाओं की सभी श्रृंखलाएं तोड़ देते हैं। निरंकुश हृदय वाले राजाओं का विवेक अभिषेक के जल से उसी प्रकार बह जाता है, जैसे बाढ़ के पानी में सब कुछ बह जाता है। डुलते हुए चंवर की वायु जैसे रजकण, मच्छर और मक्खियों को दूर उड़ा देती है, वैसे ही वृद्धों के द्वारा उपदिष्ट शास्त्रों के अर्थ तक को दूर भगा देती है। उसका छत्र जैसे धूप को रोकता है, वैसे ही सत्य को भी ढक देता है। वैभव की आंधी मैं चौंधियाई हुई उसकी आंखें उचित मार्ग नहीं देख पातीं। नहुष आदि राजा जगतविजयी थे, फिर भी जब उनका चित्त काम-मोहित हो गया, तब उन्हें अनेक विपत्तियों का सामना करना पड़ा था। यह राजा भी परम प्रतापी था, फिर भी वह लक्ष्मी समान चंचला और सुन्दरता में अप्सराओं को भी मात करने वाली उन्मादिनी के द्वारा विमोहित नहीं हुआ। उस धर्मात्मा और धीर राजा ने अपने प्राण त्याग दिए किंतु कुमार्ग पर पैर नहीं रखे। इसी से तो मैं उसे दृढ़चरित्र वाला मानता हूं। ’’
यह उत्तर सुनकर बेताल ने कहा—‘‘तुम्हारा उत्तर बिल्कुल ठीक है राजा विक्रमादित्य। किसी के व्यक्तित्व की पहचान उसके चरित्र से ही होती है। किंतु उत्तर देने के चक्कर में तुम अपना मौन रहने का संकल्प भूल गए। तुम भूले और मैं आजाद हो गया, इसलिए मैं चला अपने स्थान पर।’’ कहते हुए बेताल उसके कंधे से सरककर पुनः अपने स्थान को उड़ गया। राजा ने भी उसी प्रकार उसे फिर प्राप्त करने के लिए शीघ्रतापूर्वक उसका अनुसरण किया। महान पुरुष जब कोई कार्य आरंभ कर देते हैं, तब वह काम, चाहे जितना कठिन क्यों न हो, उसे पूर्ण किए बिना विश्राम नहीं करते।
<div align="right">▢ ▢ ▢</div>110 ▢ बेताल पच्चीसी
अट्ठारहवां बेताल: ब्राह्मणकुमार की कथा
अट्ठारहवां बेताल
ब्राह्मणकुमार की कथा
उस भयानक रात में राजा विक्रमादित्य जब उस शिंशपा-वृक्ष के पास पहुंचा तो वहां का बदला दृश्य देखकर कुछ विस्मित-सा हो गया। श्मशान का समूचा क्षेत्र श्मशान की चिता की अग्नि और मांसभक्षी भूत-प्रेतों से भरा हुआ था, जिनकी जीभें आग की चंचल लपटों के समान जान पड़ती थीं।
वहां उसने बहुत से प्रेत-शरीरों को उल्टे लटका देखा, जो देखने में एक जैसे प्रतीत होते थे। यह देखकर भी राजा भयभीत न हुआ। वह मन-ही-मन सोचने लगा—‘अरे ! यह क्या बात है ? क्या वह मायावी बेताल इस प्रकार मेरा समय नष्ट कर रहा है ? समझ में नहीं आता इन बहुत-से शवों में से मैं किसको ले जाऊं ? यदि मेरा काम हुए बिना ही यह रात बीत गई तो फिर मरने के अतिरिक्त मेरे पास कोई अन्य उपाय नहीं बचेगा। तब मैं अग्नि में प्रवेश करके अपने प्राण दे दूंगा किंतु उपहास का पात्र कदापि नहीं बनूंगा।’
राजा जब ऐसा सोच रहा था, तब उसका यह निश्चय जानकर बेताल उसकी दृढ़ता से संतुष्ट हुआ और उसने अपनी माया समेट ली। तब राजा ने एक ही मनुष्य शरीर में बेताल को देखा। उसे वृक्ष से उतारकर राजा ने अपने कंधे पर डाला और वहां से प्रस्थान किया। चलते हुए राजा से वह बेताल फिर बोला—‘‘राजन, मुझे यह देखकर बहुत आश्चर्य हो रहा है कि न तो तुम ऊबते ही हो और न अपनी जिद छोड़ते हो। उस योगी के लिए तुम निश्चय ही बहुत परिश्रम कर रहे हो। सुनो, तुम्हारे श्रम की थकान दूर करने के लिए मैं तुम्हें फिर एक कथा सुनाता हूं। ’’
तब बेताल ने यह कथा सुनाई।
आर्यावर्त्त में उज्जायिनी नाम की एक नगरी है। नागों की भूमि भोगवती और देवों की भूमि अमरावती के बाद श्रेष्ठता में तीसरा स्थान उसी का है। माता गौरी ने कठिन तपस्या के बाद जब शिव का वरण किया था, तब इस नगरी के असाधारण गुणों से आकृष्ट होकर भगवान शिव ने इसी नगरी को अपना निवास स्थान बनाया था। पुण्य की अधिकता से प्राप्त होने वाले अनेक प्रकार के सुख-भोगों से वह नगरी भरी हुई है।
उस नगरी में चंद्रप्रभ नाम का एक राजा राज करता था। उसका मंत्री एक ब्राह्मण था, जिसका नाम था—देवस्वामी। देवस्वामी बहुत धनवान था, उसने बहुत से यज्ञ भी किए थे।
समय पाकर उसे चंद्रस्वामी नाम का एक पुत्र पैदा हुआ। यद्यपि उसने विद्याओं का अध्ययन किया था, फिर भी जवानी में उसे जुआ खेलने का व्यसन पैदा हो गया।
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एक बार चंद्रस्वामी, जुआ खेलने के लिए किसी बड़े जुआखाने में गया। वहां एक से बढ़कर एक जुआरी पहले से ही मौजूद थे। चंद्रस्वामी उनके साथ जुआ खेलने लगा। दुर्भाग्य से वह अपना सारा धन हार गया। स्थिति यहां तक पहुंच गई कि वह अपने वस्त्र तथा दूसरो से मांगा हुआ धन भी हार गया। मांगने पर जब वह उस रकम को नहीं चुका सका तो उस जुआखाने के मालिक ने उसे डंडे से खूब पीटा। डंडे की चोट से चंद्रस्वामी का सारा शरीर घायल हो गया। कई दिन तक वह उसी जगह मुर्दे के समान घायल पड़ा रहा। यह देखकर उस जुआखाने के मालिक ने अपने जुआरियों से कहा—"सुनो मित्रों! तीन दिन हो गए, यह तो आंखें ही नहीं खोल रहा, पत्थर के समान हो गया है। तुम इसे मार डालो और इसका शव किसी अंधे कुएं में फेंक आओ। तुम लोगों को इसके लिए मैं उचित मुआवजा दे दूंगा।"
उसके ऐसा कहने पर दूसरे जुआरी चंद्रस्वामी को वहां से उठाकर ले गए और कुएं की खोज में दूर एक वन में जा पहुंचे। वहां एक बूढ़े जुआरी ने दूसरों से कहा—"यह तो लगभग मर ही चुका है, फिर इसे कुएं में फेंकने से क्या लाभ ? बेहतर है हम इसे यहीं छोड़ दें और उस द्यूतशाला (जुआघर) के मालिक से जाकर यह कह दें कि हम उसे कुएं में डाल आए हैं।" सबने उसकी बात का समर्थन किया और वे चंद्रस्वामी को छोड़कर चले गए।
चंद्रस्वामी को होश आया तो उसने स्वयं को एक निर्जन वन में पाया। वहां एक शिवालय बना हुआ था। तब वह लड़खड़ाता-सा उठा और थके-थके कदमों से उस मंदिर में चला गया। अंदर पहुंचकर जब उसकी हालत थोड़ी और सुधरी तो वह दुखी होकर सोचने लगा—'कैसे दुख की बात कि मुझे उन जुआरियों ने धोखे से लूट लिया। मैं नंगा हूं, घायल हूं, धूल से मेरा शरीर भरा हुआ है। ऐसी हालत में मैं जाऊं भी तो कहां जाऊं ? मेरे पिता, मेरे संबंधी और मेरे हितैषी मित्र मुझे देखकर क्या कहेंगे ? इसलिए मैं अभी तो यहीं ठहरता हूं, रात को बाहर निकलकर देखूंगा कि भूख मिटाने के लिए खाने-पीने का क्या उपाय कर सकता हूं।' थका हुआ और वस्त्ररहित चंद्रस्वामी ऐसा सोच ही रहा था कि तभी सूर्यास्त हो गया।
इसी बीच एक महाव्रती तपस्वी वहां आया। उसके समूचे शरीर में विभूति (भभूत) लगी हुई थी और जटा और शूल धारण करने के कारण वह दूसरे शिव के समान जान पड़ता था। उस तपस्वी ने जब चंद्रस्वामी से उसका परिचय पूछा तो चंद्रस्वामी ने उसे वह सारा वृत्तांत कह सुनाया जिसके कारण उसकी यह दुर्दशा हुई थी। यह सुनकर तपस्वी ने चंद्रस्वामी से दयापूर्वक कहा—"तुम्हें घबराने की आवश्यकता नहीं है वत्स। तुम मेरे अतिथि हो, यह मेरा आश्रम है। उठो और पहले स्नान करो, तत्पश्चात् मैं जो कुछ भिक्षा में मांगकर लाया हूं, उसमें से कुछ हिस्सा तुम खा लो।"
उस व्रतधारी के ऐसा कहने पर चंद्रस्वामी ने उससे कहा—"भगवन, मैं ब्राह्मण हूं। आपकी भीख में हिस्सा कैसे बांटकर खाऊंगा?"
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यह सुनकर अतिथि का आदर करने वाला वह सिद्ध व्रतधारी अपनी मटी (छोटी कुटिया) में घुस गया। वहां उसने इष्ट सिद्धि देने वाली अपनी विद्या का स्मरण किया। याद करते ही विद्या प्रकट हुई और जब उसने पूछा कि—‘‘मैं क्या करूं ?’’ तो उस तपस्वी ने आज्ञा दी कि—‘‘मेरे इस अतिथि का आतिथ्य-सत्कार करो।’’
विद्या ने कहा—‘‘ऐसा ही होगा।’’ कहकर उसने एक स्वर्ण नगर उत्पन्न कर दिया, जिसमें बगीचा भी था और सुन्दर-सुन्दर स्त्रियां भी थीं।
उस नगर से निकलकर सुन्दरियां विस्मित चंद्रस्वामी के पास आई और बोली—‘‘भद्र उठो, स्नान-भोजन करो और अपनी थकावट दूर करो।’’
यह कहकर वे उसे अंदर ले गई। स्नान कराकर उन्होंने उसके शरीर पर अंगराग लगाया। उनके द्वारा दिए गए उत्तम वस्त्र पहनने के बाद वे उसे एक दूसरे सुन्दर भवन में ले गई।
उस भवन के अंदर उसने एक सर्वांग सुन्दर युवती को देखा, जो उन सबकी प्रधान जान पड़ती थी और जिसे मानो विधाता ने बड़ी कुशलता से अपने हाथो स्वयं गढ़ा था। उसने उत्कंठापूर्वक चंद्रस्वामी को अपने आसन के आधे हिस्से पर बैठाया। फिर उसके साथ ही उसने दिव्य भोजन किया। भोजन के उपरान्त चंद्रस्वामी ने स्वादिष्ट पके हुए फल और फिर ताम्बूल (पान) खाया। फिर उसके साथ नरम बिस्तर पर सोकर चरम सुख प्राप्त किया !
सवेरे जब चंद्रस्वामी जागा तो वहां केवल उसे शिवालय ही दिखाई दिया। वहां न तो वह दिव्य स्त्री थी, न नगर था और न वे दासियां ही थीं।
तभी मठी के भीतर से हंसता हुआ वह तपस्वी निकला। उसके यह पूछने पर कि—‘‘रात कैसी कटी ?’’ उदास चित्त वाले चंद्रस्वामी ने उससे कहा—‘‘भगवन, आपकी कृपा से रात तो मैंने बहुत सुखपूर्वक बिताई लेकिन अब उस दिव्य स्त्री के बिना, मेरे प्राण निकले जा रहे हैं।’’ यह सुनकर उस दयालु तपस्वी ने मुस्कराते हुए चंद्रस्वामी से कहा—‘‘तुम यहीं ठहरो वत्स। रात को तुम्हें फिर वही सुख प्राप्त होगा।’’ तपस्वी के कहने पर चंद्रस्वामी वहीं ठहरकर तपस्वी की विद्या के प्रताप से वह हर रात सुख भोगने लगा।
धीरे-धीरे इस विद्या का प्रभाव जानकर देव प्रेरणा से एक दिन चंद्रस्वामी ने उस तपस्वी को प्रसन्न करके कहा—‘‘भगवन ! मुझ शरणागत पर यदि सचमुच आपकी कृपा है तो मुझे यह विद्या सिखा दीजिए, जिसका ऐसा प्रभाव है।’’
चंद्रस्वामी द्वारा आग्रहपूर्वक ऐसा कहने पर तपस्वी उससे बोला—‘‘वत्स यह विद्या तुम्हारे लिए असाध्य है क्योंकि इसकी साधना जल के अंदर की जाती है। जो साधक वहां इसकी साधना करता है, उसको भरमाने के लिए कई मायाजाल उत्पन्न होते है जिसके कारण वह सिद्धि नहीं प्राप्त कर सकता। वहां उसे ऐसा भ्रम होता है कि उसका फिर से जन्म हुआ है। तब वह अपने को बालक, फिर युवक, फिर विवाहित मानता है
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और उसे जान पड़ता है, जैसे उसके यहां पुत्र उत्पन्न हुआ हो। तब वह झूठे मोह में पड़ जाता है कि यह मेरा मित्र है और यह शत्रु। उसे न तो इस जन्म का स्मरण रहता है, न ही इसका कि उसकी क्रियाएं विद्या की साधना में लगी हुई हैं। जो लोग चौबीस वर्ष की आयु तक गुरु के द्वारा विद्या पढ़कर ज्ञान प्राप्त करते हैं, उन वीर पुरुषों को इस जन्म का स्मरण रहता है और वे जानते हैं कि यह सब माया का खिलवाड़ है और विद्या की सिद्धि के बाद जल से निकलकर परम ज्ञान का दर्शन करते है। ''
तपस्वी ने आगे बताया—''जिस शिष्य को यह विद्या दी जाती है, उसे यदि यह सिद्धि नहीं मिलती तो अनुपयुक्त पात्र को शिक्षा देने के कारण उसके गुरु की भी विद्या नष्ट हो जाती है। मेरी सिद्धी से ही तुम्हें उसके सब फल प्राप्त हो रहे हैं। अतः इसके लिए तुम आग्रह क्यों कर रहे हो ? कहीं ऐसा न हो कि इससे मेरी सिद्धि भी नष्ट हो जाए और जिसके द्वारा तुम ये सुख-भोग प्राप्त कर रहे हो, तुम्हें उससे भी वंचित होना पड़े।'' तपस्वी के ऐसा कहने पर चंद्रस्वामी ने हठपूर्वक कहा—''हे महात्मन ! आप चिंता न करें, मैं सब कुछ सीख लूंगा।''
इसके बाद तपस्वी ने चंद्रस्वामी को विद्या सिखाना स्वीकार कर लिया। सज्जन पुरुष आश्रितों के अनुरोध पर भला क्या नहीं करते ? तब वह नदी-तट पर ले जाकर चंद्रस्वामी से बोला—''वत्स, इस विद्या (मंत्र) का जाप रते हुए जब तुम माया के दृश्य देखो, तो सावधान रहना और मेरे मंत्र से सावधान रहकर माया की अग्नि में प्रवेश करना। मैं तब तक तुम्हारे लिए नदी के इस तट पर रुका रहूंगा।'' यह कहकर उस व्रतधारी ने आचमन करके चंद्रस्वामी को विधिपूर्वक वह विद्या सिखाई।
अनन्तर, नदी के तट पर स्थित अपने गुरु को चंद्रस्वामी ने सिर झुकाकर प्रणाम किया और शीघ्रतापूर्वक नदी में उतर गया। जल के भीतर जाकर वह उस मंत्र का जाप करने लगा, तब माया के मिथ्या प्रभाव से मोहित होकर सहसा-ही वह अपने इस जन्म की सारी बातें भूल गया। उसने देखा कि वह स्वयं किसी दूसरी नगरी में किसी अन्य ब्राह्मण का पुत्र होकर उत्पन्न हुआ। अनन्तर, वह धीरे-धीरे किशोर हुआ। उसका यज्ञोपवीत हुआ, उसने विद्याएं पढ़ीं, विवाह किया और उसके सुख-दुख में पूरी तरह लिप्त रहकर सन्तान लाभ किया। वहां पुत्र स्नेह के कारण स्वीकार किए हुए अनेक प्रकार के कार्य करता और माता-पिता तथा कुटुंबियों की प्रीति से बंधा वह रहने लगा। इस प्रकार वह झूठे जन्मांतर का अनुभव कर रहा था, तभी समय जानकर उसके गुरु उस तपस्वी ने चेतना उत्पन्न करने वाली अपनी विद्या का प्रयोग किया।
उस विद्या के प्रयोग से शीघ्र ही उसने (मायाजाल को भेदकर) चेतना प्राप्त की। उसे अपने गुरु का स्मरण हो आया और उसने मायाजाल को भी पहचान लिया। दिव्य और असाध्य फल की प्राप्ति के लिए जब वह अग्नि में प्रवेश करने को उद्यत हुआ, तब वृद्ध और विश्वासी उसके गुरु एवं उसके कुटुंबीजन उसे ऐसा करने से
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यहाँ चित्र में दिए गए हिंदी पाठ का प्रतिलेखन (transcription) है:
रोकने लगे। उन लोगों के बहुत समझाने-बुझाने पर भी दिव्य सुख की लालसा से वह अपने कुटुंबियों सहित नदी के उस तट पर गया जहां चिता बनी हुई थी। वहां उसने अपने बूढ़े माता-पिता तथा पत्नी को मरने के लिए उद्यत देखा। अपने बच्चों को भी रोता देखकर वह मोह में पड़ गया। वह सोचने लगा—'मैं यदि अग्नि में प्रवेश करूंगा तो मेरे ये सभी संबंधी मर जाएंगे। मैं यह भी नहीं जानता कि गुरु की बात सच्ची भी है या नहीं। तब मै क्या करूं—अग्नि में प्रवेश करूं या नहीं ? किंतु अब तक तो सारी बातें गुरु के कहने के अनुसार ही हुई हैं, अतः यही बात झूठ कैसे होगी ? इसलिए मुझे चाहिए कि मैं प्रसन्नतापूर्वक अग्नि में प्रवेश करूं ?' मन-ही-मन ऐसा सोचते हुए उस ब्राह्मण चंद्रस्वामी ने अग्नि ने प्रवेश किया।
अग्नि का स्पर्श जब उसे बर्फ के समान ठंडा जान पड़ा, तब उसे आश्चर्य हुआ। तब तक माया का प्रभाव जाता रहा। नदी से निकलकर उसने अपने गुरु को देखा और उनके चरणों में प्रणाम किया, पूछने पर आरंभ से लेकर अग्नि की शीतलता तक की सारी बातें उन्हें बता दीं। तब उसके गुरु ने कहा—'वत्स, मुझे इस बात की शंका हो रही है कि कहीं तुमसे कुछ भूल हो गई है, नहीं तो अग्नि तुम्हारे लिए शीतल कैसे हो गई ?'
गुरु के ऐसा कहने पर चंद्रस्वामी ने पूछा—'भगवन, मैंने कहीं कोई भूल तो नहीं की ?'
तब इस रहस्य को जानने की इच्छा से उसके गुरु ने अपनी विद्या का स्मरण किया। वह विद्या न तो उसके सम्मुख ही प्रकट हुई और न उसके शिष्य के सम्मुख ही। तब वे दोनों ही अपनी विद्या को नष्ट हुआ जानकर दुखी होकर वहां से चले गए।
यह कथा सुनाकर बेताल ने राजा विक्रमादित्य को पहली कही शपथ का स्मरण कराकर उससे पूछा—'राजन, मेरा संशय दूर करो और बतलाओ कि बताई हुई सारी क्रियाएं करने के बाद भी उन दोनों की विद्या नष्ट क्यों हो गई ?'
बेताल की बात सुनकर उस वीर राजा ने उत्तर दिया—'योगेश्वर ! यह तो मैं जानता हूं कि इस प्रकार आप केवल समय ही व्यतीत कर रहे हैं, फिर भी मैं बताता हूं। जब तक मनुष्य का मन द्विविधा से रहित, धैर्ययुक्त, निर्मल और सुदृढ़ नहीं होता, तब तक केवल ठीक तरह से कोई दुष्कर कार्य करने से ही उसे सिद्धि प्राप्त नहीं होती। वह मंदमति ब्राह्मण युवक चंद्रस्वामी काम करके भी द्विविधा में पड़ गया था, इसी से उसे सिद्धि प्राप्त नहीं हो सकी और अपात्र को देने के कारण गुरु की भी सिद्धि जाती रही।'
राजा के ऐसा कहने पर बेताल पुनः उसके कंधे से उतरकर अदृश्य रूप से अपनी जगह पर चला गया। तत्पश्चात् राजा भी उसी प्रकार उसके पीछे-पीछे गया।
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उन्नीसवां बेताल: चंद्रस्वामी की कथा
उन्नीसवां बेताल
चंद्रस्वामी की कथा
राजा विक्रमादित्य ने शिंशपा-वृक्ष से फिर बेताल को उतारा और उसे अपने कंधे पर डालकर चल पड़ा। चलते हुए बेताल ने पुनः कहा—‘‘राजन ! सुनो, मैं तुम्हें इस बार यह मनोहर कथा सुनाता हूं।’’
बहुत पहले वक्रोलस नाम का एक नगर था। जहां इन्द्र के समान एक राजा राज्य करता था। उसका नाम था—सूर्यप्रभ। राजा सूर्यप्रभ हर प्रकार से सुखी था किंतु उसे एक ही दुख था कि बहुत-सी रानियों के होते हुए भी उसे कोई संतान नहीं हुई थी। उस समय ताम्रलिप्ति नाम की एक महानगरी में धनपाल नाम का एक महाजन (सेठ) रहता था, जो उस क्षेत्र के सभी धनवानों में अग्रणी था। उसकी इकलौती पुत्री का नाम धनवती था। वह इतनी सुन्दर थी कि उसे देखकर किसी अप्सरा का भ्रम होता था। जब वह कन्या युवती हुई, तब महाजन की मृत्यु हो गई। राजा का सहारा पाकर महाजन के संबंधियों ने उसका सारा धन हड़प लिया। महाजन की पत्नी हिरण्यवती किसी प्रकार अपने रत्न एवं आभूषणों को छिपाकर अपनी पुत्री सहित, अपने संबंधियों के डर से वहां से भाग निकली। उसके हृदय में दुख का अंधेरा घिरा हुआ था। अपनी पुत्री का हाथ थामे वह बड़ी कठिनाई से नगर से बाहर निकली।
संयोगवश, अंधकार में जाती हुई हिरण्यवती ने दिख न पाने के कारण सूली पर चढ़ाए गए एक चोर को अपने कंधे से धक्का दे दिया। वह चोर जीवित था। उसके कंधे के धक्के से वह तिलमिला उठा और कराहकर कह उठा—‘‘हाय ! मेरे कटे हुए जख्मों पर कौन नमक छिड़क रहा है ?’’ इस पर उस महाजन की स्त्री ने क्षमायाचना करते हुए उस चोर से पूछा—‘‘श्रीमंत, आप कौन हैं ?’’
तब उस चोर ने उत्तर दिया—‘‘मैं एक कुख्यात चोर हूं। चोरी करने एक कारण मुझे सूली पर चढ़ाए जाने का दंड मिला है। लेकिन आर्या, आप बतलाएं कि आप कौन हैं और इस अंधकार में भटकती हुई कहां जा रही हैं ?’’
चोर के पूछने पर महाजन की पत्नी उसे अपना परिचय देने लगी, तभी चंद्रमा निकल आया और उसके प्रकाश में सारा क्षेत्र आलोकित हो गया। तब चोर ने देख लिया कि उस स्त्री के साथ चंद्रमा के मुख के समान एक कन्या भी वहां मौजूद थी। यह देखकर उसने उसकी माता से प्रार्थना की—‘‘आर्ये, तुम मेरी एक प्रार्थना सुनो। मैं तुम्हें एक हजार स्वर्णमुद्राएं दूंगा। तुम अपनी कन्या मुझे दे दो।’’ यह सुनकर धनवती की माता हंसी और चोर से पूछा—‘‘तुम तो मरने वाले हो। सूली पर टंगे
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हुए तुम्हें मरने में विलम्ब नहीं होगा। फिर क्यों मेरी कन्या का हाथ मांगना चाहते हो?''
इस पर उस चोर ने कहा—''यह सत्य है कि मेरी आयु समाप्त हो गई है, पर मैं पुत्रहीन हूं। शास्त्रों में लिखा है कि पुत्रहीन व्यक्ति की सद्गति नहीं होती। अतः यह यदि मेरी आज्ञा से किसी और के द्वारा पुत्र पैदा करेगी तो वह मेरा क्षेत्रज पुत्र होगा। इसी से मैं तुमसे यह निवेदन करता हूं कि मेरा मनोरथ पूरा करो।''
चोर की बात सुनकर महाजन की पत्नी के मन में लोभ पैदा हो गया। उसने चोर की बात स्वीकार कर ली।
तब वह महाजन की पत्नी कहीं से जल ले आई और यह कहकर उसने उस जल को चोर के हाथों पर डाल दिया कि—'मैं अपनी यह कुंवारी कन्या तुम्हें देती हूं।'
तब उस चोर ने उस कन्या को अपना क्षेत्रज पुत्र उत्पन्न करने का आदेश दिया और अपनी सास से बोला—''सामने उस बरगद के विशाल वृक्ष को देखो। उस वृक्ष की जड़ के समीप जमीन खोदो तो वहां जमीन में दबी तुम्हें कुछ स्वर्णमुद्राएं मिलेंगी। वह स्वर्णमुद्राएं निकाल लो और मेरी मृत्यु के बाद विधिपूर्वक मेरा दाह-संस्कार करा देना। तत्पश्चात् मेरी अस्थियों का किसी तीर्थस्थान में विसर्जन करने के पश्चात् अपनी कन्या सहित वक्रोलस नगर में चली आना। वहां राजा सूर्यप्रभ के शासन में वहां के लोग सुखपूर्वक रहते हैं। मुझे आशा है तुम्हें वहां रहने के लिए किसी प्रकार की कठिनाई नहीं आएगी।'' यह कहकर उस प्यासे चोर ने हिरण्यवती द्वारा लाया हुआ जल पीया और सूली पर चढ़ाए जाने की पीड़ा के कारण अपने प्राण त्याग दिए।
हिरण्यवती ने चोर के निर्देशानुसार बरगद के वृक्ष के पास जाकर स्वर्णमुद्राएं निकालीं और किसी गुप्त मार्ग से अपने पति के किसी मित्र के यहां चली गई। वहां रहकर उसने युक्तिपूर्वक उस चोर की दाह-क्रिया करवाई और उसकी अस्थियों को किसी तीर्थ में प्रवाहित कराने आदि की भी व्यवस्था कर दी।
अगले दिन वह उस छिपे धन को लेकर अपनी कन्या के साथ वहां से निकल पड़ी और चलती-चलती क्रमशः वक्रोलस नगर में पहुंच गई। वहां उसने वसुदत्त नाम के किसी श्रेष्ठ वणिक से एक मकान खरीद लिया और पुत्री सहित उस मकान में रहने लगी। उन्हीं दिनों उस नगर में विष्णुस्वामी नाम के एक अध्यापक रहते थे। मनःस्वामी नाम का उनका एक ब्राह्मण-शिष्य बहुत रूपवान था।
यद्यपि वह ब्राह्मण-शिष्य उत्तम कुल का था तथापि यौवन के वशीभूत होकर हंसाबलि नाम की एक विलासिनी के प्रेम में फंस गया था। हंसाबलि शुल्क के रूप में पांच-सौ स्वर्णमुद्राएं मांगती थी और इतना धन उसके पास नहीं था इसलिए वह उसे पाने को दिन-रात बेचैन रहता था।
एक दिन उस महाजन की कन्या धनवती ने अपने मकान की छत पर से उस
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