बेताल पच्चीसी
Betal Pachisi
by महाकवि सोमदेव / बेताल भट्ट
Page 109 of 151
Read in contextराजा विक्रमादित्य के कंधे पर लदे बेताल ने यह कथा सुनाकर पूछा—‘‘राजन ! अब तुम यह बतलाओ कि उस राजा और सेनापति में से, सेनापति बलधर क्यों अधिक दृढ़चरित्र नहीं था ? उसकी स्त्री तो अलौकिक सुन्दरी थी। उसने बहुत समय तक उसके साथ सुख भोगकर उसका स्वाद जाना था, फिर भी वह वैसी स्त्री को राजा को सौंपने को तत्पर हो गया ता और फिर, राजा की मृत्यु के बाद उसने स्वयं भी अपना शरीर अग्नि में होम करके अपने प्राण त्याग दिए थे। लेकिन, राजा ने उसकी उस पत्नी का त्याग किया था, जिसके भोग-रस का उसने आस्वादन भी नहीं किया था। भला ऐसा क्यों हुआ था ? इस प्रश्न का उत्तर जानते हुए भी यदि तुम मौन रहोगे तो तुम्हें मेरा वही शाप लगेगा।’’
राजा हंसकर बोला—‘‘बेताल ! कहते तो तुम ठीक ही हो लेकिन इसमें अचरज की क्या बात है ? सेनापति कुलीन वंश का था, उसने स्वामी की भक्ति में जो किया, ठीक ही किया क्योंकि सेवक का तो कर्त्तव्य ही है कि वह प्राण देकर भी अपने स्वामी की रक्षा करे लेकिन राजा तो मदमत्त हाथी की तरह निरंकुश होते हैं। वे जब विषय-लोलुप होते हैं तब धर्म और मर्यादाओं की सभी श्रृंखलाएं तोड़ देते हैं। निरंकुश हृदय वाले राजाओं का विवेक अभिषेक के जल से उसी प्रकार बह जाता है, जैसे बाढ़ के पानी में सब कुछ बह जाता है। डुलते हुए चंवर की वायु जैसे रजकण, मच्छर और मक्खियों को दूर उड़ा देती है, वैसे ही वृद्धों के द्वारा उपदिष्ट शास्त्रों के अर्थ तक को दूर भगा देती है। उसका छत्र जैसे धूप को रोकता है, वैसे ही सत्य को भी ढक देता है। वैभव की आंधी मैं चौंधियाई हुई उसकी आंखें उचित मार्ग नहीं देख पातीं। नहुष आदि राजा जगतविजयी थे, फिर भी जब उनका चित्त काम-मोहित हो गया, तब उन्हें अनेक विपत्तियों का सामना करना पड़ा था। यह राजा भी परम प्रतापी था, फिर भी वह लक्ष्मी समान चंचला और सुन्दरता में अप्सराओं को भी मात करने वाली उन्मादिनी के द्वारा विमोहित नहीं हुआ। उस धर्मात्मा और धीर राजा ने अपने प्राण त्याग दिए किंतु कुमार्ग पर पैर नहीं रखे। इसी से तो मैं उसे दृढ़चरित्र वाला मानता हूं। ’’
यह उत्तर सुनकर बेताल ने कहा—‘‘तुम्हारा उत्तर बिल्कुल ठीक है राजा विक्रमादित्य। किसी के व्यक्तित्व की पहचान उसके चरित्र से ही होती है। किंतु उत्तर देने के चक्कर में तुम अपना मौन रहने का संकल्प भूल गए। तुम भूले और मैं आजाद हो गया, इसलिए मैं चला अपने स्थान पर।’’ कहते हुए बेताल उसके कंधे से सरककर पुनः अपने स्थान को उड़ गया। राजा ने भी उसी प्रकार उसे फिर प्राप्त करने के लिए शीघ्रतापूर्वक उसका अनुसरण किया। महान पुरुष जब कोई कार्य आरंभ कर देते हैं, तब वह काम, चाहे जितना कठिन क्यों न हो, उसे पूर्ण किए बिना विश्राम नहीं करते।
<div align="right">▢ ▢ ▢</div>110 ▢ बेताल पच्चीसी