बेताल पच्चीसी
Betal Pachisi
by महाकवि सोमदेव / बेताल भट्ट
Page 111 of 151
Read in contextएक बार चंद्रस्वामी, जुआ खेलने के लिए किसी बड़े जुआखाने में गया। वहां एक से बढ़कर एक जुआरी पहले से ही मौजूद थे। चंद्रस्वामी उनके साथ जुआ खेलने लगा। दुर्भाग्य से वह अपना सारा धन हार गया। स्थिति यहां तक पहुंच गई कि वह अपने वस्त्र तथा दूसरो से मांगा हुआ धन भी हार गया। मांगने पर जब वह उस रकम को नहीं चुका सका तो उस जुआखाने के मालिक ने उसे डंडे से खूब पीटा। डंडे की चोट से चंद्रस्वामी का सारा शरीर घायल हो गया। कई दिन तक वह उसी जगह मुर्दे के समान घायल पड़ा रहा। यह देखकर उस जुआखाने के मालिक ने अपने जुआरियों से कहा—"सुनो मित्रों! तीन दिन हो गए, यह तो आंखें ही नहीं खोल रहा, पत्थर के समान हो गया है। तुम इसे मार डालो और इसका शव किसी अंधे कुएं में फेंक आओ। तुम लोगों को इसके लिए मैं उचित मुआवजा दे दूंगा।"
उसके ऐसा कहने पर दूसरे जुआरी चंद्रस्वामी को वहां से उठाकर ले गए और कुएं की खोज में दूर एक वन में जा पहुंचे। वहां एक बूढ़े जुआरी ने दूसरों से कहा—"यह तो लगभग मर ही चुका है, फिर इसे कुएं में फेंकने से क्या लाभ ? बेहतर है हम इसे यहीं छोड़ दें और उस द्यूतशाला (जुआघर) के मालिक से जाकर यह कह दें कि हम उसे कुएं में डाल आए हैं।" सबने उसकी बात का समर्थन किया और वे चंद्रस्वामी को छोड़कर चले गए।
चंद्रस्वामी को होश आया तो उसने स्वयं को एक निर्जन वन में पाया। वहां एक शिवालय बना हुआ था। तब वह लड़खड़ाता-सा उठा और थके-थके कदमों से उस मंदिर में चला गया। अंदर पहुंचकर जब उसकी हालत थोड़ी और सुधरी तो वह दुखी होकर सोचने लगा—'कैसे दुख की बात कि मुझे उन जुआरियों ने धोखे से लूट लिया। मैं नंगा हूं, घायल हूं, धूल से मेरा शरीर भरा हुआ है। ऐसी हालत में मैं जाऊं भी तो कहां जाऊं ? मेरे पिता, मेरे संबंधी और मेरे हितैषी मित्र मुझे देखकर क्या कहेंगे ? इसलिए मैं अभी तो यहीं ठहरता हूं, रात को बाहर निकलकर देखूंगा कि भूख मिटाने के लिए खाने-पीने का क्या उपाय कर सकता हूं।' थका हुआ और वस्त्ररहित चंद्रस्वामी ऐसा सोच ही रहा था कि तभी सूर्यास्त हो गया।
इसी बीच एक महाव्रती तपस्वी वहां आया। उसके समूचे शरीर में विभूति (भभूत) लगी हुई थी और जटा और शूल धारण करने के कारण वह दूसरे शिव के समान जान पड़ता था। उस तपस्वी ने जब चंद्रस्वामी से उसका परिचय पूछा तो चंद्रस्वामी ने उसे वह सारा वृत्तांत कह सुनाया जिसके कारण उसकी यह दुर्दशा हुई थी। यह सुनकर तपस्वी ने चंद्रस्वामी से दयापूर्वक कहा—"तुम्हें घबराने की आवश्यकता नहीं है वत्स। तुम मेरे अतिथि हो, यह मेरा आश्रम है। उठो और पहले स्नान करो, तत्पश्चात् मैं जो कुछ भिक्षा में मांगकर लाया हूं, उसमें से कुछ हिस्सा तुम खा लो।"
उस व्रतधारी के ऐसा कहने पर चंद्रस्वामी ने उससे कहा—"भगवन, मैं ब्राह्मण हूं। आपकी भीख में हिस्सा कैसे बांटकर खाऊंगा?"
112 ❑ बेताल पच्चीसी बेताल पच्चीसी—7