About this granth
Betal Pachisi (बेताल पच्चीसी), 'twenty-five tales of the vetala', is one of India's most popular story cycles. It goes back to the Sanskrit Vetalapanchavimshati, a version of which appears in the Kathasaritsagara of the eleventh-century Kashmiri poet Somadeva. In the frame story King Vikramaditya, at a mendicant's request, sets out to carry a corpse inhabited by a vetala down from a tree in the cremation ground. On the way the vetala tells him a story ending in a riddle; when the king answers correctly, the vetala flies back to the tree, and so the cycle of twenty-five tales unfolds.
This book tells the stories in order, from Padmavati and the three young Brahmins to the parrot and the myna, Viravara, Somaprabha, Princess Anangarati, Madanasena, Jimutavahana, Unmadini, Chandrasvami, Anangamanjari and Manivarma, the four Brahmin brothers and the ascetic.
The title page credits the original to Somadeva Bhatta. The Hindi retelling is by Ved Prakash Soni with illustrations by Shankar Nayak, published by Jan Sahitya Parishad, Delhi, in 2002, and runs to 151 pages.
तेईसवां बेताल: अघोरी तपस्वी की कथा
तेईसवां बेताल
अघोरी तपस्वी की कथा
भूत-प्रेतो से भरे उस महाश्मशान में राजा विक्रमादित्य फिर से उस शिंशपा-वृक्ष के नीचे पहुंचा। यद्यपि बेताल ने अपने अनेक रूप दिखलाए किंतु राजा ने उसे वृक्ष से नीचे उतार लिया और उसे अपने कंधे पर लादकर चुपचाप मार्ग पर चलते रहे। तब बेताल ने राजा विक्रमादित्य से कहा—"राजन ! न करने योग्य इस काम में भी तुम्हारा ऐसा आग्रह है, जिसे रोका नही जा सकता। अतः मैं तुम्हारी थकावट दूर करने के लिए एक अन्य कथा सुनाता हूं, सुनो।"
कलिंगा देश में स्वर्गपुरी के समान भव्य नगरी थी, जहां उत्तम आचरण वाले लोग रहते थे। वहां ऐश्वर्य और पराक्रम के लिए प्रद्युम्न के समान प्रसिद्ध, प्रद्युम्न नाम का राजा शासन करता था। उस नगर के एक छोर पर यज्ञस्थल नाम का एक गांव था जिसे राजा प्रद्युम्न ने ब्राह्मणों को दान स्वरूप दिया था। उसी गांव में यज्ञसोम नाम का एक वेदज्ञ ब्राह्मण भी रहता था, जो अत्यंत धनवान था। वह अग्निहोत्री था तथा अतिथि-देवों का सम्मान करने वाला था।
जब उस ब्राह्मण का यौवन बीत गया, तब सौ-सौ मनोरथों के बाद, उसके ही योग्य उसकी पत्नी के एक पुत्र उत्पन्न हुआ। उत्तम लक्षणों वाला वह बालक पिता के घर में बढ़ने लगा। ब्राह्मणों ने विधिपूर्वक उसका नाम देवसोम रखा। वह बालक, जिसने अपनी विद्या, विनय आदि गुणों से लोगों को वशीभूत कर लिया था, जब सोलह वर्ष का हुआ, तब अचानक ज्वर के कारण मृत्यु को प्राप्त हो गया। उसके पिता यज्ञसोम ने स्नेह के कारण अपनी पत्नी सहित उस मरे हुए पुत्र को आलिंगन में बांधे रखा और बहुत देर तक उसके शव को दाह-क्रिया के लिए नहीं जाने दिया।
बाद में, वहां इकट्ठे हुए बड़े-बूढ़ों ने उसे इस प्रकार समझाया—"ब्राह्मण, आप तो भूत और भविष्य को जानने वाले हैं। आप क्या जल के बबूले के समान क्षण-भंगुर इस संसार की गति नहीं जानते ? इस संसार में ऐसे भी राजा थे, जो उन मनोहर राजमहलों में रत्नजडित पलंगों पर बैठते, जहां संगीत की झंकार भरी रहती थी, अपने शरीर पर चन्दन का लेप करते थे और अपने को अमर समझकर उत्तम स्त्रियों से घिरे रहते और सुख भोगते थे। ऐसे महापराक्रमियों को भी काल ने अपना ग्रास बना लिया। वे भी अकेले ही उस श्मशान में पहुंचे जहां उनके अनुयायी और प्रेत रो रहे थे और आसपास शृगाल चीत्कार कर रहे थे। चिता पर सोये उनके शरीर का मांस भी पक्षी, पशुओं और अग्नि ने खा डाला। जब उन्हें भी मरने और नष्ट होने से कोई नहीं बचा सका, तब और की तो बात ही क्या है ? अतः हे विद्वान ! तुम यह
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बतलाओ कि कि इस शव को कलेजे से लगाए रखकर तुम क्या करोगे ?"
इस तरह समझाने-बुझाने के बाद किसी तरह अपने मरे हुए पुत्र को छोड़ा और शव को नहलाया-धुलाया। तब उसे एक पालकी में रखकर, आंसू बहाते तथा रोते-पीटते वे बन्धु-बांधव, जो वहां इकट्ठे थे, श्मशान ले गए।
उस श्मशान में कुटिया बनाकर एक बूढ़ा तपस्वी रहता था। वह पाशुपत मत का योगी (अघोरी) था। अधिक अवस्था और कठोर तपस्या के कारण उसका शरीर अत्यंत कृश हो गया था। जब वह चलता था तो ऐसा लगता जैसे अब गिरा कि तब गिरा।
उसका नाम शिव था। उसका सारा शरीर भस्म लगे श्वेत रोमों से भरा हुआ था। उसका पीला जटाजूट बिजली के समान जान पड़ता था। वह स्वयं दूसरे शिव जैसा प्रतीत होता था।
उस तपस्वी के साथ उसकी कुटिया में एक शिष्य भी रहता था। योगी ने कुछ ही देर पहले उसे बुरा-भला कहा था, जिससे वह चिढ़ा हुआ था। वह मूर्ख और दुष्ट था। ध्यान और योग आदि क्रियाओं में लगा रहने के कारण उसे अहंकार हो गया था। वह भीख में मिले हुए अन्न को खाकर निर्वाह करता था। बाहर दूर से आते हुए इस जन-कोलाहल को सुनकर योगी ने उससे कहा—"बाहर जाकर झटपट यह तो देखकर आओ कि इस श्मशान में ऐसा शोरगुल क्यों हो रहा है, जैसा इससे पहले कभी नहीं सुना गया।"
गुरु के ऐसा कहने पर उस शिष्य ने उत्तर दिया—"मैं नहीं जाऊंगा, आप ही जाइए। मेरी भिक्षा की बेला बीती जा रही है।"
यह सुनकर योगी बोला—"अरे पेटू, धिक्कार है तुझे। आधा दिन बीत जाने पर यह तेरी कैसी भिक्षा की बेला है ?"
इस पर उस क्रुद्ध तपस्वी ने कहा—"अरे बुड्ढे, धिक्कार मुझे नहीं तुझ पर है। आज से न तो मैं तेरा शिष्य हूं और न तू मेरा गुरु। मैं दूसरी जगह जा रहा हूं। तू संभाल अपना यह कमंडल।" यह कहकर वह उठा और उस तपस्वी के सम्मुख दंड-कमंडल रखकर वहां से चलता बना।
कुछ देर बाद, वह तपस्वी हंसता हुआ अपनी कुटिया से बाहर निकलकर वहां पहुंचा जहां ब्राह्मणकुमार को दाह-कर्म के लिए लाया गया था। उसने देखा कि लोग तरुणाई के द्वार पर खड़े उस बालक के लिए शोक कर रहे हैं। बुढ़ापे से क्षीण उस योगी ने बालक के शरीर में प्रवेश करने का निश्चय किया। झटपट एकान्त में जाकर पहले तो वह जी खोलकर रोया, फिर अंगों के उचित संचालन के साथ शीघ्रता से नाचने लगा। पल-भर बाद यौवन की इच्छा रखने वाले उस तपस्वी ने अपना शरीर छोड़कर उस ब्राह्मण-पुत्र के शरीर में प्रवेश किया।
बात ही बात में सजाई हुई चिता पर वह ब्राह्मण-पुत्र जीवित होकर जम्हाई लेता हुआ उठ बैठा। यह देखकर वहां उपस्थित सभी लोग आश्चर्यचकित रह गए। ब्राह्मण-पुत्र के
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शरीर मे प्रविष्ट उस योगी ने जो योगों का स्वामी था और अपने तमाम व्रतों को छोड़ना नहीं चाहता था, बातें बनाते हुए कहा—"मरकर जब मैं परलोक पहुंचा तो भगवान शिव ने प्रकट होकर मुझे जीवनदान दिया और कहा कि तुम्हें पाशुपत (अघोरी) व्रत लेना है। मुझे इसी समय एकान्त में जाकर यह व्रत ग्रहण करना है। यदि मैं ऐसा नहीं करूंगा तो जीवित नहीं रहूंगा। इसलिए आप सब लोग वापस लौट जाइए, मैं जा रहा हूं।"
इस प्रकार उस तपस्वी ने, जिसने व्रत का दृढ़ निश्चय कर रखा था, वहां एकत्र हुए हर्ष और शोक से विह्वल सब लोगों को समझा-बुझाकर, घर लौटा दिया। तत्पश्चात् उसने उस जगह जाकर, जहां उसका पहला शरीर पड़ा हुआ था, वह मृत शरीर एक गड्ढे में डाला और व्रत धारण करके युवा शरीर में वह महायोगी कहीं अन्यत्र चला गया।
राजा विक्रमादित्य को यह कथा सुनाकर बेताल ने उससे पुनः कहा—"राजन, अब तुम मुझे यह बतलाओ कि दूसरे शरीर में प्रवेश करने से पहले वह योगी क्यों रोया और फिर नाचने क्यों लगा ? मुझे इस बात को जानने का बड़ा कौतूहल हो रहा है।"
बेताल की यह बात सुनकर, शाप से आशंकित और बुद्धिमानों में श्रेष्ठ राजा ने मौन त्याग दिया और बेताल से कहा—"हे बेताल ! इन बातों से उस तपस्वी का जो अभिप्राय था, वह सुनो।
"उस वृद्ध तपस्वी ने सोचा—'इस बूढ़े शरीर के साथ बहुत दिनों तक मैं सिद्धियों की साधना करता रहा हूं। अब मैं इस शरीर का त्याग करने जा रहा हूं जिसे मां-बाप ने बचपन में लाड़-प्यार से पाला था।'
"यही सोचकर वह तपस्वी दुखी हुआ और रोया था क्योंकि शरीर का मोह छोड़ना बड़ा कठिन काम होता है। इसी प्रकार वह यह सोचकर प्रसन्नता से नाच उठा था कि अब वह नए शरीर में प्रवेश करेगा और इससे भी अधिक साधना कर सकेगा।"
शव के शरीर में बैठा हुआ वह बेताल, राजा की यह बातें सुनकर उसके कंधे से उतरकर पुनः उसी शिशपा-वृक्ष पर जा बैठा। राजा विक्रमादित्य ने और अधिक उत्साह से उसे ले आने के लिए फिर उसका पीछा किया।
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चौबीसवां बेताल: एक अद्भुत कथा
चौबीसवां बेताल
एक अद्भुत कथा
वह रात किसी राक्षसी के समान थी। श्मशान में यत्र-तत्र जलती हुई चिताएं ही मानो उस राक्षसी की आंखें थीं। ऐसी महाभयानक रात में राजा विक्रमादित्य फिर से शिंशपा-वृक्ष के नीचे पहुंचा और बेताल को नीचे उतार लिया। फिर वह उसे कंधे पर डालकर मौनभाव से अपने गंतव्य की ओर चल दिया। कुछ आगे चलकर बेताल ने पुनः मौन भंग किया—‘‘राजन ! बार-बार की इस आवाजाही से मै तो बिल्कुल ऊब चुका हूं किंतु तुम पर कोई फर्क नहीं पड़ा है। अब मैं तुमसे एक महाप्रश्न पूछता हूं, इसे सुनो। ’’
दक्षिणपथ में धर्मनाम का एक मांडलिक राजा राज करता था। वह राजा बहुत ही सद्गुणी था। उसके बहुत से गोत्रज (परिवारजन) थे। उसकी स्त्री का नाम चंद्रावती था, जो मालवा की रहने वाली थी और वहां के एक संभ्रान्त परिवार में पैदा हुआ थी। राजा को अपनी उस पत्नी से एक ही कन्या उत्पन्न हुई जिसका नाम लावण्यवती था। अपने नाम के अनुरूप ही लावण्यवती सचमुच ही मानो रूप का खजाना थी।
जब वह कन्या विवाह के योग्य हुई, तब राजा के गोत्रजों ने उसके विरुद्ध एक षड्यंत्र रचा। उन्होंने राज्य में फूट डाल दी और राजा धर्मनाम को सिंहासन से उतार दिया। वे उसके खून के प्यासे बन गए। एक रात राजा अपनी पत्नी और पुत्री सहित किसी प्रकार बचकर वहां से निकल भागा। वह अपने साथ बहुत ही उत्तम कोटि के कुछ रत्नों को भी ले जाने में कामयाब हो गया। राज्य से निकलकर राजा अपनी ससुराल मालवा के लिए चल पड़ा। पत्नी और पुत्री के साथ जाता हुआ जब वह विंध्याचल पर्वत के निकट पहुंचा तो रात हो गई। किसी प्रकार वह रात उन सबने उसी जंगल में काटी और भोर होते ही पुनः आगे चल पड़े।
वैभव और ऐश्वर्य में पले-बड़े होने के कारण उन्होंने कभी पैदल सफर नहीं किया था, अतः उनके पांव कांटों से छिल गए थे। इस तरह चलते-चलते वे एक भीलों के गांव में जा पहुंचे। उस गांव के भील चोर-लुटेरे थे। धन के लिए किसी की भी हत्या तक कर देना उनके लिए मामूली बात थी। वस्त्र और आभूषण पहनने वाले राजा को दूर से ही देखकर, वे उन्हें लूटने के लिए अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्र हाथों में लिए उनकी ओर दौड़ पड़े।
उन्हें देखकर राजा धर्मनाम ने अपनी स्त्री और कन्या से कहा—‘‘ये म्लेच्छ पहले तुम्हारे ही ऊपर आक्रमण करेंगे, अतः तुम दोनों तुरन्त वन में जाकर छिप जाओ। ’’
राजा के ऐसा कहने पर, भय के कारण रानी चंद्रावती अपनी कन्या को साथ लेकर तत्काल वन में चली गई। कुछ देर उपरान्त ही वे लूटेरे भील राजा के पास
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यहाँ चित्र में दिए गए हिंदी पाठ का प्रतिलेखन (transcription) है:
पहुंच गए और अपने अस्त्र-शस्त्रों से राजा पर टूट पड़े। राजा ने अपनी समस्त शक्ति से उनका मुकाबला किया। उसने अपने तीरों से अनेक लुटेरों को मार गिराया, पर अन्ततः लुटेरों ने उस पर सामूहिक रूप से आक्रमण किया और उसे मारकर उसके शरीर के समस्त आभूषण उतारकर ले गए।
दूर वन में छिपी हुई रानी और उसकी पुत्री ने यह दृश्य देखा तो प्राणों के भय से वह वहां से भाग निकलीं और दूर के घने जंगल में चली गई। उस जंगल में एक सरोवर के समीप वृक्ष के नीचे बैठकर वह दोनों विलाप करने लगीं। इसी बीच उस वन के निकट रहने वाला, घोड़े पर सवार कोई राजा आखेट करने के लिए अपने पुत्र के साथ उधर आ निकला। उस राजा का नाम था चंद्रसिंह और उसके पुत्र का नाम सिंहपराक्रम था। धूल में उभरे हुए उन मां-बेटी के पदचिन्ह देखकर चंद्रसिंह ने अपने पुत्र से कहा—‘‘हम दोनों इन सुन्दर और उत्तम रेखाओं वाले पद-चिन्हों का अनुसरण करते हुए आगे बढ़ते हैं। ये चिन्ह अवश्य ही दो महिलाओं के हैं। यदि वे स्त्रियां हमें मिल जाएं तो उनमें से एक को तुम ब्याह लेना।’’
पिता की बात सुनकर उसका पुत्र सिंहपराक्रम बोला—‘‘उन स्त्रियों से जिसके छोटे-छोटे पैर हैं, मैं उसी के साथ विवाह करूंगा। अवश्य ही वह स्त्री कम उम्रवाली है और मेरे योग्य है। दूसरी बड़े पैरों वाली से आप विवाह कर लेना।’’
पुत्र की बात सुनकर उसका पिता बोला—‘‘तुम यह कैसी बातें करते हो पुत्र। तुम्हारी माता को मरे अभी कुछ ही दिन तो बीते हैं। वैसी योग्य गृहणी को खोकर अब मुझे किसी और की कामना कैसे हो सकती है?’’
इस पर उसके पुत्र सिंहपराक्रम ने उत्तर दिया—‘‘पिताजी, आप ऐसा न कहें। मैने जिस स्त्री के पदचिन्ह देखकर उसे अपने लिए पसंद किया है, उसे छोड़कर दूसरी स्त्री को आप अपनी भार्या अवश्य बनाएं, आपको मेरे प्राणों की सौगन्ध’’। फिर दोनों, पैरों के निशान देखते हुए धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगे।
जब वे दोनों विलाप करती हुई उन मां-बेटी के निकट पहुंचे तो दोनों स्त्रियां सहमकर चुप हो गईं। उन्होंने उन बाप-बेटे को भी कोई लुटेरा ही समझा था। लेकिन जब राजा ने उन्हें अपना परिचय देकर निर्भय होने के लिए आश्वस्त किया, तब वे दोनों स्त्रियों को अपने घोड़े पर बिठाकर अपने महल ले आए। महल में पहुंचकर उन पिता-पुत्र में आपस में यह वार्तालाप हुआ कि अब उन स्त्रियों के साथ विधिपूर्वक विवाह कर लेना चाहिए। दिए गए वचन के अनुसार राजा चंद्रसिंह के पुत्र सिंहपराक्रम ने रानी चंद्रावती को अपनी पत्नी बनाया क्योंकि उसी के पैर छोटे थे, जबकि राजा चंद्रसिंह को उसकी बेटी लावण्यवती से विवाह करना पड़ा क्योंकि उसके पैर बड़े थे। इस प्रकार पैरों की गड़बड़ी से उन पिता-पुत्रों ने क्रमशः बेटी और माता से विवाह कर लिया। चंद्रावती अपनी ही बेटी की बहू बन गई। समय पाकर उन दोनों को पुत्र एवं कन्याएं उत्पन्न हुईं और फिर उनके भी बेटी-बेटे हुए।
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रात्रि के समय मार्ग में जाते हुए बेताल ने इस प्रकार यह कथा सुनाकर राजा विक्रमादित्य से पुनः पूछा—‘‘राजन्, यदि तुम जानते हो तो यह बतलाओ कि उन मां-बेटियों को, पुत्र एवं पिता के द्वारा क्रमशः जो सन्तानें पैदा हुईं, उनका आपस में क्या संबंध हुआ ? यदि जानते हुए भी तुमने नहीं बतलाया, तो तुम्हें पहले कहा हुआ ही शाप लगेगा। ’’
यह सुनकर राजा विक्रमादित्य सोच में पड़ गया। उन्होंने बहुत सोचा-विचारा किंतु बेताल के उस प्रश्न का कोई भी उत्तर उनकी समझ में नहीं आया। अतः वह चुप्पी साधे मौन भाव से आगे बढ़ता रहा। मृत पुरुष के शरीर में प्रविष्ट और राजा के कंधे पर बैठा बेताल इस पर मन-ही-मन हंसा और सोचने लगा—‘इस महाप्रश्न का उत्तर इस राजा को मालूम नहीं है, फिर भी यह प्रसन्न है और सावधानीपूर्वक पैर रखता हुआ निरंतर आगे बढ़ रहा है। यह राजा बड़ा पराक्रमी है, इसलिए वंचित होने के योग्य नहीं है। इसके अतिरिक्त वह भिक्षु मेरे साथ जो चाल चल रहा है, वह इतने से ही चुप नहीं रहेगा। इसलिए मैं उस दुरात्मा को ही उपायपूर्वक वंचित करूंगा और उसकी सिद्धि इस राजा के लिए सुलभ कर दूंगा, क्योंकि भविष्य में इसका कल्याण होने वाला है।’
ऐसा सोचकर बेताल ने राजा से कहा—‘‘राजन्, इस भयानक रात में, इस श्मशान में बार-बार आते-जाते तुमने बहुत कष्ट उठाया है, फिर भी तुम अपने निश्चय से नही डिगे, तुम सुख पाने के योग्य हो। मैं तुम्हारे इस आश्चर्यजनक धैर्य से संतुष्ट हुआ। अतः अब तुम इस शव को ले जाओ, मैं इसमें से चला जाता हूं। लेकिन जाने से पहले तुम्हारी भलाई के लिए मैं जो तुमसे कहना चाहता हूं, उसे सुनो और उसके अनुसार ही कार्य करो।’’
बेताल ने आगे कहा—‘‘हे राजन् ! तुम जिस दुष्ट भिक्षु के लिए मनुष्य का यह शरीर लेकर जा रहे हो, वह आज इस शरीर में मेरा आह्वान करके पूजा करेगा। पूजा करने के बाद वह दुष्ट तुम्हारी ही बलि चढ़ाने की इच्छा से तुमसे कहेगा कि—‘भूमि पर पड़कर साष्टांग प्रणाम करो।’ तब उस समय तुम उस भिक्षु से कहना—‘पहले तुम करके दिखलाओ, फिर मैं वैसा ही करूंगा।’ तत्पश्चात् जब वह भूमि में पड़कर प्रणाम करके तुम्हें दिखलाए, उसी समय तुम तलवार से उसका मस्तक काट देना। तब विद्याधरों का जो ऐश्वर्य वह प्राप्त करना चाहता है, वह तुम्हें मिल जाएगा। उसकी बलि देकर तुम पृथ्वी का भोग करोगे। ऐसा नहीं करोगे तो तुम्हारी बलि चढ़ा देगा। मैंने इसी कारण तुम्हारे इस कार्य में इतनी देर तक विघ्न डाला था। जाओ, तुम्हें सफलता प्राप्त हो।’’ इतना कहकर राजा के कंधे पर लदे मृत शरीर से निकलकर बेताल चला गया।
बेताल की बातों से प्रसन्न हुए राजा विक्रमादित्य भी उस शव को लादे वट-वृक्ष की ओर चल पड़ा जहां उस भिक्षु ने उसे पहुंचने के लिए कहा था।
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पच्चीसवां बेताल: भिक्षु शान्तशील की कथा
पच्चीसवां बेताल
भिक्षु शान्तशील की कथा
राजा विक्रमादित्य अपने कंधे पर शव को लादे हुए उस भिक्षु शान्तशील के पास पहुंचे। कृष्णपक्ष की रात से भयावह हो रहे उस श्मशान में वृक्ष की जड़ के समीप बैठा वह भिक्षु टकटकी लगाए राजा की ही प्रतीक्षा कर रहा था। उसने श्मशान की उस भूमि को रक्त से लीप रखा था। हड्डियों के सफेद चूर्ण से चौक पूरा था और चारों दिशाओं से रक्त से भरे घड़े रख दिये थे। वहां मनुष्य की चरबी से भरा दीपक जल रहा था। पास ही जल रही अग्नि में आहुति दी गई थी।
राजा उस भिक्षु के समीप पहुंचा। शव लेकर आए राजा को जैसे ही उस भिक्षु ने देखा, वह प्रसन्न होकर उठ खड़ा हुआ और राजा की प्रशंसा करता हुआ बोला—‘‘महाराज ! आपने मुझ पर दुष्कर अनुग्रह किया है। वे लोग, जो आपको समस्त राजाओं में श्रेष्ठ कहते हैं, वह उचित ही है क्योंकि एक आप ही हैं जो अपनी चिंता छोड़कर परोपकार कर सकते हैं। विद्वान लोग इसी को बड़ों की महत्ता कहते हैं कि वे लोग जो भी अंगीकार कर लेते हैं, उससे कभी विचलित नहीं होते, चाहे उस प्रयास में उनके प्राण ही क्यों न चले जाएं।’’
ऐसा कहते हुए उस श्रमण ने, जो यह समझ रहा था कि उसका कार्य पूर्ण हो गया, राजा के कंधे से उस शव को उतार लिया। तत्पश्चात् उसने शव को स्नान कराया, उसके शरीर पर लेप किया, माला पहनाई और फिर उसे पूरे हुए चौक में रख दिया। फिर उसने अपने शरीर पर भस्म लगाई, केस का यज्ञोपवीत धारण किया और शवाच्छादन (मुर्दे को ओढ़ाया जाने वाला कफन) पहना, फिर कुछ देर के लिए ध्यानस्थ हो गया।
उस भिक्षु ने मंत्रबल से उस श्रेष्ठ बेताल का आह्वान किया। मनुष्य के शरीर में प्रविष्ट कराने के बाद वह क्रम से उसकी पूजा करने लगा। भिक्षु ने मनुष्य की खोपड़ी से उसे अर्घ्य दिया। मनुष्य के ही दांतों के फूल चढ़ाए और सुगंधित लेप लगाया। उसने मनुष्य की आंखों का धूप दिया और मांस की बलि दी। इस तरह पूजा समाप्त करके उसने पास ही खड़े राजा से कहा—‘‘महाराज, यहां मंत्रों के अधिष्ठाता पधारे हैं। तुम भूमि पर लेटकर इन्हें साष्टांग प्रणाम करो, इससे वे वरदायी देव तुम्हें तुम्हारा मनचाहा वर देंगे।’’
यह सुनते ही राजा को बेताल द्वारा कहे गए शब्दों की याद हो आई। तब उसने भिक्षु से कहा—‘‘भगवन्, मैं ऐसा करना नहीं जानता, अतः पहले आप प्रणाम करके मुझे दिखला दें, तब मैं वैसा ही करूंगा। इसके बाद वह भिक्षु, प्रणाम का ढंग बतलाने के लिए ज्योंही भूमि पर झुका, राजा विक्रमादित्य ने अपनी तलवार से तुरंत ही उसका सिर काट डाला।
बेताल पच्चीसी ❏ 149
राजा ने उसका सीना फाड़कर उसका हृदय-कमल भी निकाल लिया और वह सिर और हृदय-कमल बेताल को अर्पित कर दिया।
श्मशान के भूत-प्रेतों ने प्रसन्न होकर राजा को साधुवाद कहा। संतुष्ट होकर बेताल ने भी उस मनुष्य शरीर के अंदर से कहा—‘‘राजन ! यह भिक्षु विद्याधरों के जिस इन्द्रपद की कामना करता था, वह अब भूमि साम्राज्य का भोग कर लेने के बाद तुम्हें प्राप्त होगा। मेरे द्वारा तुम्हें बहुत कष्ट उठाना पड़ा है, अतः तुम अभीष्ट वर मांगो।‘’
बेताल के ऐसा कहने पर राजा उससे बोला—‘‘वैसे तो आपकी प्रसन्नता से ही मुझे समस्त अभिमत प्राप्त हो गए हैं, तथापि हे योगेश्वर ! आपका वचन अमोघ है इसलिए मै इतना ही मांगता हूं कि अनेक कथाओं के मनोरम आरंभ से चौबीस और यह अंतिम पच्चीसवीं कथा, ये सभी समूचे विश्व में प्रसिद्ध हों और सदैव ही आदरणीय रहें।‘’
राजा की इस याचना के बाद बेताल ने कहा—‘‘हे राजन ! ऐसा ही होगा। किंतु इससे अधिक मैं जो कुछ चाहता हूं, तुम उसे सुनो। पहले की जो चौबीस कथाएं हैं, वे और अंतिम पच्चीसवीं कथा, यह सारी कथावली संसार में ‘बेताल पच्चीसी’ के नाम से प्रसिद्ध होगी। लोग इनका आदर करेंगे और कल्याणदायिनी भी होगी। जो कोई आदरपूर्वक इसका एक भी श्लोक पढ़ेगा अथवा जो इसे सुनेगा, ऐसे दोनों प्रकार के लोग शीघ्र ही पापमुक्त हो जाएंगे। जहां-जहां भी ये कथाएं पढ़ी-सुनी जाएंगी, वहां यक्ष, बेताल, डाकिनी, राक्षस आदि का प्रभाव नहीं पड़ेगा।‘’ इतना कहकर वह बेताल उस मनुष्य-शरीर से निकलकर योगमाया के द्वारा अपने अभीप्सित लोक को चला गया।
तत्पश्चात् भगवान शिव, जो राजा से प्रसन्न हो गए थे, देवताओं सहित वहां साक्षात् प्रकट हुए। उन्होंने राजा विक्रमादित्य को प्रणाम करते हुए आदेश दिया—‘‘वत्स, तुम धन्य हो कि तुमने इस धूर्त तपस्वी को मार डाला। जो हठपूर्वक विद्याधरों का महाचक्रवर्ती पद प्राप्त करना चाहता था। म्लेच्छ रूप में अवतीर्ण असुरों को शांत करने के लिए मैंने ही तुम्हें सिरजा है। अतः द्वीपों और पातालों सहित इस धरती के समस्त भोगों का उपभोग करके जब तुम इनसे ऊब जाओगे, तब अपनी ही इच्छा से उन सब सुखों का त्याग करके तुम मेरे निकट आ जाओगे। अब मेरे द्वारा प्रदत्त यह ‘अपराजित’ नाम का खड्ग स्वीकार करो। इसकी कृपा से तुम्हें वह सब सुख प्राप्त होंगे, जो मैंने तुम्हें बताए हैं।‘’
यह कहकर भगवान शिव ने वह खड्ग राजा को दे दिया और वचन-रूपी पुष्पों से पूजित होकर वे अन्तर्ध्यान हो गए।
अब तक रात बीत चुकी थी, सवेरा हो रहा था। राजा ने देखा कि सारे कार्य समाप्त हो चुके हैं; अतः वह अपने नगर लौट गया।
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बेताल पच्चीसी □ 151
क्रमशः प्रजाजनों को जब उस रात की घटनाएं मालूम हुईं, तब उन्होंने राजा का सम्मान किया और महोत्सव मनाया। वह सारा दिन स्नान-दान, शिवार्चना, नाच-गान और गाजे-बाजे में बीता। कुछ ही समय में भगवान शिव के उस खड्ग के प्रभाव से, राजा विक्रमादित्य ने द्वीपों एवं रसातलों सहित इस धरती पर निष्कंटक राज्य किया। तत्पश्चात् भगवान शिव की आज्ञा से विद्याधरों का महान स्वामित्व प्राप्त किया। राजा विक्रमादित्य ने बहुत दिनों तक विद्याधरों के राजा के रूप में सुख-भोग प्राप्त किया और अंत में वह भगवत् स्वरूप को प्राप्त हुआ।
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