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बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

by महर्षि बौधायन

Source: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (origin)

DevanagariHindipublished486 pages

Page 207 of 486

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Page 207

प्रथमः खण्डः ] द्वितीयप्रश्ने प्रथमोऽध्यायः १५५

मतिपूर्वं घ्नतस्तस्य निष्कृतिर्नोपलभ्यते ॥ ६ ॥

अनु०- इस सन्दर्भ में निम्नलिखित पद्य उद्धृत किया जाता है—
जो व्यक्ति अनजान में ही ब्राह्मण की हत्या करता है वह धर्मानुसार पापमुक्त हो जाता है। ऋषियों ने अनजान में ही ब्राह्मणवध करने पर उस व्यक्ति के लिए दोष से मुक्ति का विधान किया है, किन्तु जानबूझ कर वध करने वाले व्यक्ति को पाप से मुक्ति नहीं मिलती ॥ ६ ॥

टि०- मनु का कथन भी द्रष्टव्य है कि जानबूझकर ब्राह्मण की हत्या करने पर इस पाप से मुक्ति का उपाय नहीं है।

अमत्या ब्राह्मणमिति ब्राह्मणोऽयमित्यविज्ञाय हननमुच्यते। अमतिपूर्वकं इत्यनेन 'च ब्राह्मणोऽयमिति निश्चितेऽपि प्रमादकृतं हननम् ॥

आह च मनुः—
कामतो ब्राह्मणवधे निष्कृतिर्न विधीयते ॥ इति ॥

तथा—
कामकारकृतेऽप्याहुरेके श्रुतिनिदर्शनात् ॥ ६ ॥

अथ ब्राह्मणविषयहिंसायामेवं प्राग्भाविषु व्यापारेषु प्रायश्चित्तमाह—

अपगूर्य चरेत्कृच्छ्रमतिResponse to the above in Devanagari text strictly follows this transcription:

अपगूर्य चरेत्कृच्छ्रमतिकृच्छ्रं निपातने ।
कृच्छ्रं चान्द्रायणं चैव लोहितस्य प्रवर्त्तने ॥
तस्मान्नैवाऽपगुरेत न च कुर्वीत शोणितमिति ॥ ७ ॥

अनु०- ब्राह्मण को मारने के लिए हाथ उठाने पर कृच्छ्र व्रत करे, प्रहार करने पर अतिकृच्छ्र व्रत करे और मार कर खून निकालने पर कृच्छ्र तथा चान्द्रायण व्रत करे अतएव ब्राह्मण के ऊपर न तो हाथ उठावे और न उस पर प्रहार कर उसका रुधिर बहावे ॥ ७ ॥

टि०- अपगूरण मारने के लिए प्रयत्न करने को कहते हैं। द्रष्टव्य-गौतमधर्मसूत्र पृ० २१८ में ब्राह्मण के ऊपर हथियार उठाने पर सो वर्ष ओर देने पर सहस्र वर्षं तक स्वर्ग की प्राप्ति न होने का उल्लेख है।

कथं पुनरवगम्यः—ब्राह्मणापगोरणादिष्वेवैतानि प्रायश्चित्तानीति ?
उच्यते—निषेधस्तावद्ब्राह्मणविषय एवोपलभ्यते—'तस्माद्ब्राह्मणाय नाऽपगु-
रेत न निहन्यान्न लोहितं कुर्यात्' इति। यत्र च निषेधः, प्रायश्चित्तेनाऽपि
तत्रस्थेन भवितव्यम्। अपगूरणं नाम हिंसाऽर्थमुद्यमः। अप्रसृष्टमन्यत् ॥ ७ ॥

नव समा राजन्यस्य ॥ ८ ॥