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बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

by महर्षि बौधायन

Source: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (origin)

DevanagariHindipublished486 pages

Page 208 of 486

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Page 208
१५६बौधायन-धर्मसूत्रम्[ प्रायश्चित्तम्

अनु०—क्षत्रिय की हत्या करने पर नौ वर्ष का प्रायश्चित्त करे ॥ ८ ॥

टि०—यह स्पष्ट कर देना उचित है कि क्षत्रिय के वध पर नौ वर्ष तक उपयुक्त ब्राह्मण वध काम प्रायश्चित्त करना विहित है या सामान्य ब्रह्मचर्य व्रत का । गोविन्दस्वामी की व्याख्या के अनुसार "प्रागुक्तं ब्रह्महत्याव्रतं चरेत्" ब्यूह्लर ने अपने अनुवाद में सामान्य ब्रह्मचर्य व्रत से ही तात्पर्य लिया है । इस संबन्ध में गौतमधर्मसूत्र में कहा गया है कि क्षत्रिय की हत्या करने पर छः वर्ष तक सामान्य ब्रह्मचर्य का व्रत करे तथा एक सहस्र गौ एक सांड के साथ दान करे । २२।१४ पृ० २२४ ।

वध इति शेषः । नव संवत्सरान् राजन्यस्य वधे प्रागुक्तं ब्रह्महत्याव्रतं चरेदिति ॥ ८ ॥

तिस्रो वैश्यस्य ॥ ९ ॥

अनु०—वैश्य की हत्या करने पर तीन वर्ष का प्रायश्चित्त करे ॥ ९ ॥

टि०—इस सूत्र कि व्याख्या में गोविन्दस्वामी ने तीन वर्ष तक ब्रह्मचर्य का आचरण करने का ही नियम ग्रहण किया है ।

संवत्सरत्रयं प्रागुक्तं ब्रह्मचर्यचरणम् ॥ ९ ॥

संवत्सरं शूद्रस्य स्त्रियाश्च ॥ १० ॥

अनु०—शूद्र का और स्त्री का वध करने पर एक वर्ष का प्रायश्चित्त करे॥१०॥

टि०—यहां सूत्र के 'च' शब्द से गोविन्दस्वामी ने यह अर्थ भी ग्रहण किया है कि गुणहीन क्षत्रिय और वैश्य के वध का भी यही प्रायश्चित्त समझना चाहिए ।

शूद्रं हत्वा संवत्सरं प्रायश्चित्तमित्यनुवर्तते । चशब्दः क्षत्रियवैश्ययोरपि निर्गुणयोर्हनने एतदेव प्रायश्चित्तमिति दर्शयितुम् ॥ १० ॥

ब्राह्मणवदात्रेय्याः ॥ ११ ॥

अनु०—ऋतुस्नान की हुई स्त्री के वध के समान ही प्रायश्चित्त होता है ॥११॥

टि०—रजस्वला, ऋतुस्नाता स्त्री को आत्रेयी कहते हैं । जिस वर्ण की ऐसी आत्रेयी का वध किया हो उस वर्ण के पुरुषवध के लिए विहित प्रायश्चित्त होता है । गौतम० 'आत्रेय्या चैवम्' २२।१२ ॥

आत्रेयी आपन्नगर्भा । तथा वसिष्ठो निब्रूते—'रजस्वलामृतुस्नातामात्रेयीमाहुः । अत्र होप्यदपत्यं भवति' इति । ब्राह्मणग्रहणं च प्रदर्शनार्थम् । स्वजातीयात्रेय्या वधे स्वजातीयपुंवधवत् प्रायश्चित्तमित्यतिदेशः । विगुणसगुणविभागोऽपि द्रष्टव्यः । सगुणहननप्रायश्चित्तं सगुणाहनन एवाऽतिदिश्यते