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आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक

Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)

DevanagariHindipublished235 pages

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आयुर्वेद-दर्शन

और परादि प्रयत्नांत ये सब द्रव्य के गुण हैं। मधुरादि आस्वादों में जिन गुरुत्वादि गुणों का उल्लेख है वे आस्वादों में नहीं रहते (क्योंकि यह सिद्धांत है कि गुणों में गुण नहीं रहते) बल्कि आस्वादधिकरण द्रव्यों में रहते हैं। और आस्वादों में उनका उल्लेख भी इसी अभिप्राय से किया गया है। अग्नीषोम लोकपक्षियों के प्रति उनका यह भी कथन है कि भिन्न २ तंत्रकारों के भिन्न २ अभिप्राय रहते हैं उन अभिप्रायों को समझ बुझकर ही उनके विधानों का अर्थ लगाना चाहिए। ( च. सू. अ. २६ )

अग्नीषोमवादियों को इस तरह फटकारनेवाले चाहे धातु पंचकवादी ही क्यों न हों पर इसमें पुनर्वसु आत्रेय का भी अंग दिखाई देता है। और इसपर से यह भी ज्ञात होता है कि अग्नीषोमवादी अथवा त्रिधातु सिद्धांतवादी वार्योंविद जो कि षड्हरसों को गुर्वीदि गुणमूलक कहते थे; द्रव्य का प्राधान्यत्व स्वीकार नहीं करते थे। इस विवाद का रहस्य हम को तब तक ज्ञात नहीं होगा जब तक हम वार्योंविद के त्रिधातु सिद्धांत का और पुनर्वसु आत्रेय के अंतिम निर्णय का अभ्यास न करें।

त्रिधातु सिद्धांत का आरंभ

त्रिधातु सिद्धांत के सृष्टि विज्ञान में और षड्हरसवादियों के सृष्टिविज्ञान ( सूर्य, वायु, चंद्र इनसे क्रमशः ऋतु, रस, दोष देह व वल्ल की उत्पत्ति होती है ) में बाह्यतः