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आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक

Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)

DevanagariHindipublished235 pages

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चार्योविद् का रसवाद और त्रिधातु सिद्धांत

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सादृश्य है। चूंकि जबकि त्रिधातुसिद्धांत अग्नीषोमवाद का 'उत्तर रूप' है तब त्रिधातुसिद्धांत के विवेचन का आरंभ अग्नीषोमवाद के विवेचन से भी किया जा सकता है। किंतु आयुर्वेद क्षेत्र में इस सिद्धांत की प्रतिष्ठा श्लेष्मपित्तवात विषयक ज्ञान के भित्तिपर हुई है अतः हम भी त्रिधातुसिद्धांत के विवेचन का आरंभ श्लेष्मपित्तवात विषयक ज्ञानविहास से करते हैं।

वातपित्त श्लेष्माओं का इतिहास

श्लेष्म, पित्त, वात, इनके विषय में सामान्यतः दो तरह से विचार किया जाता था; एक उन के शरीरगत उत्पत्ति स्वरूप कार्य आदि के विषय में और दूसरा उन के लोकगत अधिष्ठान स्वरूप कार्य आदि के विषय में।

प्रस्तुत में हम को इतना ही देखना है कि यज्जः पुरुषीय परिषद् के समय तक श्लेष्म पित्त वात विषयक ज्ञान में कितनी प्रगति हुई थी और वह किस क्रम से हुई थी। यहां यह ध्यान में रखना चाहिये कि इस समय हमारे सामने श्लेष्म पित्तवात विषयक जो कुछ भी साहित्य है वह एक तो नष्टावशेष मात्र एवं अपर्याप्त है, दूसरे उसमें भिन्न २ संप्रदायों के परस्पर विरोधी वक्तव्य भी शामिल हैं और तिसरे उनको संस्कार कर्ताओं ने इस तरह संकलित किया है कि उनमें जिधर उधर एकवाक्यता ही प्रतीत हो।